"वामपंथ चुनाव हार सकता है , उसकी चुनावी जमानतें भी जप्त हो सकती है , हो सकता है कि उसे कभी संसदीय मोर्चे पर पूरे भारत में एक भी सीट हासिल न हो , तब भी वामपंथ का अस्तित्व रहेगा | क्योंकि श्रम और पूँजी की लड़ाई में श्रम खत्म नहीं हो सकता , यह पूँजी की मजबूरी है की वह श्रम का अमानविय शोषण तो कर सकता है लेकिन उसे खत्म नहीं कर सकता | खत्म अगर हो सकता है तो वह है पूँजी | श्रम की हिफाजत और श्रमिकों की संघर्ष की अगुआयी ही वामपंथी राजनीति है न कि कोई धर्म , जाति , नस्ल का शगुफा उछालना | इतिहास गवाह है धर्म , जाति , नस्ल की भावना का उफान एक खास समय में उन्माद के रूप में चढ़ता अवश्य हैं लेकिन खत्म भी उसे ही होना पड़ता है |" - दयानिधि चौधरी
*साभार* जलेस, दिल्ली, व्टसएप ग्रुप से साभार
[18/3 6:52 am] अश्विनी कुमार "सुकरात":
9210473599 नम्बर को, जो मेरा है, ज्यादा से ज्यादा प्रगतिशील ग्रुपों में डाले... आपके संपर्क में जो प्रगतिशील प्रवृति के - वैज्ञानिक द्वंधात्मक भौतिकतावाद/यथार्थवाद(जिसे हम मार्क्सवाद ही बोलते है) विचारधारा पर विश्वास करने वाल उनका न भी ग्रुपोंएवं ब्रोडकॉस्ट में शामिल करने के लिए भेजे...मुझें लगता है कि मार्क्सवाद को वैज्ञानिक द्वंधात्मक भौतिकतावाद/यथार्थवाद से ही संबोधित करना चाहिए...क्योकि हर शब्द मानव चेतना के एक नए आयाम को छुता है...मार्क्सवाद करने पर लगता है कि उसका सारा वाद एक व्यक्ति तर सिमट कर रह गया.… हमें लोगों के साथ संवाद कर उनकी चेतना को पहले वैज्ञानिक अथार्थ त्थयों की जांचपड़ताल के आधार पर सोच विचार कर निर्णय लेने वाला और फिर संपत्ति और गैरसंपत्ति के हितोंमें फर्क समझने वाला और इस स्थिती का विश्लेषण करने की क्षमता रखने वाला , फिर लोकतांत्रिक रूप से संघर्ष करने वाला बनाना है.............
आपकी साथी .... सुकरात.....
[18/3 6:34 am] अश्विनी कुमार "सुकरात": हमें एक खुले दिमाग से विचार करने की प्रवृति को बढ़ावा देना है.. हरतरह के हिंसात्मक तरिकों का विरोध.. जैसे नकस्लियों ने सर्वहारा को सर्वहारा के विरूद्ध खड़ा किया...क्योकि जो आदिवासी मरते है वे भी सर्वहारा.. जो मजदूर-किसान के बच्चे जो अर्धसैनिक बलों में काम करते है वेभी सर्वहारा वर्ग से ही आए है न कि टाटा-बिडला-अंबानी खानदान के..इसलिए मावोवादी तरिका हमारी वैचारिक लड़ाई को कमजोर करता है..भगतसिंह का तरिका ही सार्थक है..क्योकि उसके बम्ब में धमाका था पर छरे नहीं थे ... इसी लिए वैचारिक वैज्ञयानिक चेतना को जागृत करने की जरूरत है..ऐसा कर पाए तो लोकतांत्रिक तरिके से भी समाजवाद साम्यवाद आ सकता है.....
खेल खत्म - तो क्या पैसा हजम..?

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