हम सब भारत माता की है संतान, तो क्यो अधिकतर है कंगले और चंद धनवान??


एक तरफ भारत माँ कहते है , साथ भारत माँ के टुकड़े टुकडें करते है । भारत माँ के खदानों की दलाली करते है । भारत माँ के गरीब आदिवासी बच्चों को बेदखल कर भारत माँ का सारा खनिज से अच्छादित आँचल चंद देशी अमीरों और विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले के हवाले कर दते है... 
एक बढ़ई मेज बनाता है। बढ़ई मेज का मालिक हुआ । तो वह उसे बेचने का अधिकारी है।
एक फैक्टरी का मालिक मजदूरों को लगा कर पदार्थ बनाता है। फैक्टरी का मालिक पदार्थ का मालिक हुआ । वह उसे बेचने का अधिकारी है।
पर भारत माँ की भूमि को किसने बनाया????
क्या किसी इंसान की पैदावार है, भारत माँ की भूमि ??????
यदि नहीं ? तो किसी एक का मालिकाना हक कैसे हो सकती है भूमि ??? 
कोई कैसे इसकी खरीद फरोख़ कर सकता है ??? 
कोई कैसे भूमि का मालिक बन जाता है ???????
क्या कोई माता अपने अधिकतर बच्चों को खस्ताहाल और चंद को मालामाल कर सकती है?
ऐसी माता को भला हम क्या कहेगे? ????
हम सब भारत माता की संतान है तो क्यों अधिकतर है निर्बल चंद माला-माल। अधिकतर बच्चों को न तो दो वक्त का पोषण वाला भोजन ही नशीब होता है, न शिक्षा के लिए स्कूल और न ही ईलाज के लिए हस्पताल। चंद लोगों के पास माँ की भूमि का बड़ा बड़ा खण्ड है, तो अधिकतर या तो फुटपाथ पर या इधर उधर झुग्गियों किराए के मकानों में। भला ये कैसे संभव है??
माँ की प्रथम चिंता उसके कमजोर और बीमार बच्चे ही होते है। माता की प्रथम चिंता में उसके वे ही बच्चे होते है जो कमजोर और बीमार होते है। पर माता कमजोर और बीमार बच्चों के स्थान पर सबल और सामर्थवान बच्चों की ही चिंता में घुलने लगे तो हम क्या कहे? क्या कोई माता ऐसा कर सकती है भला??
क्या ऐसी अन्यायपूर्ण व्यवस्था भारत माँ ने की है??? भला कोई माँ, कैसे ऐसी गैरबरबरी की अन्यायपूर्ण व्यवस्था कर सकती है??? समान्य से समान्य माँ नहीं कर सकती तो भारत माँ कैसे कर सकती है???
या माँ की आड में कोई और है जो यह गैरबराबरी की शोषणकारी व्यवस्था को बनाए रखे है???????

 इस छोटे से वैचारिक विशलेषण के साथ आपका साथी,अश्विनी कुमार सुकरात”,
जनचेतना जनमुक्ति अभियान (भगतसिंहवादी)(9210473599)
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