देश के सबसे घने जिले, उत्तरी-पूर्वी दिल्ली की अनियोजित कॉलोनी, सोनिया विहार के बच्चों को शिक्षा अधिकार प्राप्त हुआ? आप भी अपने क्षेत्र का अध्ययन करें।
देश के सबसे घने जिले, उत्तरी-पूर्वी दिल्ली की अनियोजित
कॉलोनी, सोनिया विहार के बच्चों को मिले ‘शिक्षा अधिकार’ का
मूल्यांकन
Ø
समस्या
क्षेत्र दिल्ली राज्य के उत्तरी-पूर्वी जिले में आता है।
District Census Handbook of All the Nine
Districts से मिली जानकारी के अनुसार उत्तरी-पूर्वी जिले की
विशेषताएं :-
·
यह
जिला राज्य के कुल क्षेत्रफल का 4.2 प्रतिशत हिस्से में है और
क्षेत्र के हिसाब में यह जिला छठे स्थान पर आता है।
·
जनसंख्या
के मामले में, यह जिलों के बीच पांचवें स्थान पर है क्योंकि यह दिल्ली
की जनसंख्या का 13.4 प्रतिशत आबादी साझा करता है।
·
जिले
की आबादी का घनत्व 36155 है, जो देश में सबसे ज्यादा है।
·
0-6
आयु वर्ग की जनसंख्या का अनुपात 13.5% है। जो इस राज्य
में सबसे ज्यादा है।
·
83.1
% साक्षरता दर के साथ, इस जिले
की साक्षरता राज्य में की सबसे कम है।
·
इस
जिले की कार्य भागीदारी दर, पुरुष और महिलाओं दोनों के लिए सबसे कम है। इससे एक
अनुमान यह भी लगाया जा सकता है कि 0-18 साल के युवा-वर्ग की जनसंख्या सबसे ज्यादा
है।
·
आबादी
के घनत्व के हिसाब से उत्तरी-पूर्वी दिल्ली सिर्फ दिल्ली का ही नहीं अपितु
सम्पूर्ण भारत का सबसे घना इलाका है।
·
यह
जिला तीन तहसीलों (Sub-District) शहादरा, सीमा-पुरी, सीलमपुर
में विभाजित है।
·
राज्य
के 1695 सरकारी माध्यमिक स्कूलों में से मात्र 191 ही इस क्षेत्र
में आते है। अर्थात 11.36 %
( स्रोत्र :- http://www.edudel.nic.in/ )
·
राज्य
के 1750 एमसीडी स्कूलों में से मात्र 198
ही इस क्षेत्र में आते है। अर्थात 11.36 % ( स्रोत्र
:- http://www.edudel.nic.in/ )
·
राज्य
के 925 उच्च माध्यमिक स्कूलों में से 111 उत्तरी पूर्वी राज्य में आते है। अर्थात
कुल का 12%।
Ø समस्या क्षेत्र – सोनिया विहार, सीलमपुर तहसील, नई
दिल्ली
·
एशिया
के सबसे बड़े वाटर प्लांट के नाम से जाना जाने वाला सोनिया विहार दिल्ली के
उत्तरी-पूर्वी जिले के सीलमपुर तहसील में आता है।
·
सोनिया
विहार इस तहसील में बसा एक बहुत ही घना आबादी का इलाका है। 2011 की जनगणना के
अनुसार इस क्षेत्र की आबादी 2 लाख के करीब है। इस क्षेत्र में तेजी के साथ लोगों
का यहा आकर बसना जारी है। अतः विविध स्रोत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार
वर्तमान में इसकी आबादी 4-5 लाख के बीच है। यदि सोनिया विहार के साथ सटे, सोनिया
विहार से भी कही अधिक घने इलाके,
राजीव विहार (कच्ची खजूरी) की जनसंख्या को भी इस आबादी
में जोड़ ले तो, तो यमुना के दो बांधों के बीच बसे इस छोटे से इलाके की
कुल जनसंख्या 6-7 लाख करीब हो जाएगी।
·
इस
क्षेत्र की आबादी का घनत्व 80-90 हजार प्रति किलोमीटर हो जाएगा। जो जिले के औसत
घनत्व से तीन गुना अधिक है।
·
यह
इलाका शादतपुर गुजरान, चौहान पट्टी एवं सभा पुर गांव की खेतीहर एवं यमुना के बाढ़
क्षेत्र की जमीन का हिस्सा हुआ करता था। इस क्षेत्र में बसने वाले अधिकतर लोग
उतरांचल, बिहार और युपी से है।
·
तेजी
से हो रहे पलायन के दबाव में, प्रशासन के नाक के नीचे अनधिकृत रूप में कॉलोनिया
बसी।
·
सरकारी
तंत्र की निगाह के नीचे, अपेक्षाकृत कम रोजगार के अवसर वाले क्षेत्रों से रोजगार
की तलाश में राजधानी दिल्ली में हो रहे लगातार पलायन की वजह से यमुना के दो बांधों
के बीच के इस क्षेत्र में लोग बसते चले गये।
ऐसा लगता है कि इस इलाके का नामकरण भी तत्कालीन सरकारों के राजनेताओं को
खुश करने एवं उनका इस बसावट पर मौन रहने के हिसाब से रखा लगता है। नहीं तो, इतनी
बड़ी संख्या में लोग आकर बसते जाएं और सरकार को पता भी न चले, यह कैसे संभव है?
·
इस
छोटे से क्षेत्र में बसने वाले अधिकतर लोग निम्न मध्यमवर्गीय श्रेणी के है।
·
इस
इलाके की जनसंख्या किसी मध्य आकार के शहर से कम नहीं है। इस इलाके की जनसंख्या की
ताकत को इस तरह से समझ सकते है कि इस छोटे से इलाके से दो MCD के
पार्षद चुने जाते है। यदि इस क्षेत्र को अपनी स्थानीय सरकार बनाने का अधिकार मिल
जाए तो, इस क्षेत्र की अपनी नगर पालिका और/या
नगर निगम भी बन सकती है।
·
इस
क्षेत्र की आबादी कई मध्य आकार के शहरों से अधिक या बराबर है। जैसे- देहरादून,
भागलपुर आदि
·
परन्तु
यदि इस क्षेत्र की नागरिक सुविधाओं की बात की जाए तो, क्या
शिक्षा,क्या स्वास्थ्य, यह
इलाका प्रति व्यक्ति(1000 व्यक्ति) पर मिलने वाली जनसुविधाओं के मामले में एक दूर
दराज के गांव से भी बदतर स्थिति में है।
·
हर
तरह की नागरिक सुविधाओं से वंचित,
इस इलाके का सिर्फ एक ही सकारात्मक पक्ष है। वह पक्ष यह
है कि यह इलाका मुख्य दिल्ली शहर से ज्यादा दूर नहीं है। अन्यथा स्कूल हो, वॉकेशनल
ट्रेनिग सैंटर हो, कॉलेज हो या हस्पताल, डाक, हर
तरह की नागरिक सुविधाओं का नितांत अभाव है।
Ø
सोनिया
विहार इलाके की विद्यालयी शिक्षा की व्यवस्था
·
जैसा
जनगणना 2011 के आंकडों से भी ज्ञात होता है कि उत्तरी-पूर्वी जिले की कुल जनसंख्या
का 13.5% हिस्सा 0-6 साल का है। जो स्वभाविक रूप से 2018 में 6-14 साल के मध्य ही
होगा।
·
समस्या
की डिग्री को समझने के लिए हम यही अनुपात सोनिया विहार का भी मान लेते है
·
वास्तविक
आंकड़ों के आभाव में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि जनसंख्या का लगभग 50 % हिस्सा 0-18 साल के बीच का होगा। उसका भी लगभग
आधा हिस्सा 6-14 साल के बच्चों का होगा है।
·
अपूर्ण(Rough)
आंकड़ो के आधार पर हम मान लेते है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या 3-3.5 लाख करीब हुई और 1.5-1.75 लाख करीब
जनसंख्या 6-14 साल के बच्चों की हुई ।
·
0-18
वर्ष की उम्र वह उम्र है,
जब बच्चा अपना शारीरिक, मानसिक
एवं भावनात्मक विकास करते हुए पूर्ण युवा में तब्दील होता है। उसके संतुलित
शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक विकास के लिए आंगनबाड़ी, प्राथमिक, माध्यमिक, उच्चमाध्यमिक
विद्यालय, खेलकुद केन्द्रों आदि
की आवश्यकता होती है।
·
सोनिया
विहार के 6-11 साल तक के 60-70 हजार बच्चों के लिए पहली से पांचवी कक्षा तक का
सिर्फ एक एमसीडी प्राथमिक स्कूल (सरकारी) बिल्डिंग है। इसी प्रकार राजीव विहार एवं
कच्ची खजूरी के 50-60 हजार बच्चों पर एक एमसीडी प्राथमिक स्कूल (सरकारी) बिल्डिंग
है। ये दोनों स्कूल बिल्डिंगों में दो शिफ्ट में स्कूल चलते है।
·
इस
पूरे इलाके(सोनिया विहार,
राजीव विहार, कच्ची खजूरी) में
6-12वीं कक्षा के लिए पांचवे पुस्ते स्थित मात्र एक दिल्ली सरकार का
सेकेंडरी-सह-सीनियर सेकेंडरी स्कूल है। वह भी दो शिफ्ट में चलता है। यह स्कूल भी
कॉलोनी के दूसरे छोर पर स्थित होने की वजह से शेष सोनिया विहार, राजीव
विहार, कच्ची खजूरी से पर्याप्त दूरी रखता है। इस प्रकार यह
स्कूल शेष कॉलोनी से कटा हुआ है। कॉलोनी के मुख्य हिस्से में कोई स्कूल नहीं है।
·
ये
सरकारी स्कूल किसी भी तरह से सोनिया विहार, राजीव
विहार, कच्ची खजूरी के बच्चों की संख्या के हिसाब से पर्याप्त
नहीं है। इस वजह से गली-गली में निजी प्राथमिक/माध्यमिक स्कूल(लगभग 50-60) खुल रहे
है। जिसमें से (5-6) को छोड़ सभी गैर मान्यता प्राप्त है।
·
इन
निजी स्कूलों में पढ़ाने वाले अधिकतर शिक्षक गैर-अहर्ता मतलब, ‘अंडर
क्वालिफाइड’ और ‘अंट्रेंड’
है। इस इलाके के शायद ही किसी निजी स्कूल के पास पूर्ण
अहर्तायुक्त शिक्षकों का स्टॉफ हो।
·
शिक्षा
अधिकार अधिनियम के अनुसार शिक्षक होने की न्युनतम योग्यता में उसकी शैक्षिक
योग्यता, व्यवसायीक योग्यता(डीएड, बीएलएड, बीएड
) एवं टीचर एलिजिबिलिटी टैस्ट(CTET)
होना अनिवार्य है। परन्तु इस योग्यता को पूरा किए बीना
भी कई लोग इन निजी स्कूलों में औने-पौने दाम पर शिक्षण कर रहे है।
·
गौर
करने वाली बात यह है कि शैक्षणिक कार्य में लगे इन स्कूल कर्मियों को शिक्षा
अधिकार अधिनियम के तहत ‘शिक्षक’ नहीं माना जा
सकता। तो इन कर्मियों के द्वारा विद्यार्थियों को पढ़ाने की क्रिया को भी ‘शिक्षा’ नहीं
माना जा सकता।
·
इस
प्रकार सोनिया विहार,
राजीव विहार, कच्ची
खजूरी, इलाके के सरकारी स्कूल एवं गैर सरकारी स्कूल में पढ़ने
वाले 6-11 + 11-14 साल के बच्चे( विद्यार्थी) ‘शिक्षा
अधिकार अधिनियम’
के अनुरूप ‘शिक्षा
अधिकार(भारतीय संविधान 21A)’
से पूर्णतः वंचित
है।
·
छोटी-छोटी
तंग इमारतों में चलने वाले ये निजी स्कूल, विद्यार्थियों
के शारीरिक विकास के लिए खेल-कुद का पर्याप्त स्थान देने में अक्षम ही नहीं, इन
स्कूलों में आग-आगजनी जैसी आपदा की स्थिति में विद्यार्थियों के निकासी का
पर्याप्त प्रबंध नहीं है। इस प्रकार, सिर्फ
शिक्षा अधिकार (अनुच्छेद 21A)
ही नहीं, जीवन
के अधिकार(21) का भी खुल्लम-खुला उलंघन हो रहा है।
·
एक
ऐसा स्कूल जो विद्यार्थियों को खेल कुद के माध्यम से शारीरिक, सामुदायिक
गतिविधियों के माध्यम से भावनात्मक एवं विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र के माध्यम से
बौद्धिक विकास के लिए अवसर नहीं प्रदान करता, ऐसे
स्कूल को शिक्षा अधिकार अधिनियम के अनुरूप विद्यालय माना भी नहीं जा सकता।
·
ऐसी
स्थिति में वे निजी स्कूल जिसमें आपदा(आग आदि), शारीरिक
विकास(खेल-कुद के लिए मैदान आदि) एवं सरकार द्वारा तय तंख्वाह पर, 30
विद्याथीं :1 शिक्षक के अनुपात में सीटैट पास, पूर्ण
अहर्तायुक्त शिक्षक नहीं है,
ऐसी स्कूलों को
स्कूल की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए।
·
बहुत
सारे विद्यार्थी माध्यमिक कक्षा पास पास तो कर जाते है। पर वे , आधारभूत लेखन और पठन क्षमता तक हासिल नहीं कर पाते।
·
इसीसे
भी खतरनाक विद्यार्थी विवेचनात्मक एवं रचनात्मक कौशल के स्थान पर सिर्फ जानकारियों
का पुलिंदा भर हासिल कर पास होते जाते। यह Wastage and Stagnation उस Wastage and Stagnation से कही अधिक खतरनाक है। जिसमें विद्यार्थी फेल होकर
कक्षा को छोड़ जाता था या एक ही कक्षा में कई कई वर्ष लगाता था।
·
अब
सवाल यह उठता है कि शिक्षा अधिकार अधिनियम का उलंघन करने वाली शिक्षा की दूकानों
को सरकार ने विद्यालय के रूप में मान्यता क्यों दिया हुआ है और यदि वे बीना
मान्यता के चल रहे है, तो ये स्कूल चल कैसे रहे है?
यह स्पष्ट नहीं है।
·
बहुत
से लोग अपने बच्चों को इस क्षेत्र से बाहर के स्कूलों में भी भेजते है। स्कूलों की
पर्याप्त संख्या के आभाव में यहाँ के लोग अपने बच्चों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए
यमुनाविहार, लुडलों कैसल, तिमारपुर, मोरी
गेट जैसे इलाकों में भेजने के लिए विवश
है। जिसकी वजह से सिर्फ आवागमन का अतिरिक्त खर्च ही नहीं आता, अपितु बच्चों
का जीवन भी जोखिम में पड़ता है।
·
प्रयाप्त
साधनों के आभाव में, विद्यार्थी अपने जीवन को जोखिम में डाल कर, बसों
के पायदानों पर लटक कर यात्रा करने को मजबूर है। नानकसर तिराहे पर, ये
बच्चे अक्सर अंजान लोगों से लिफ्ट की गुहार करते पाये जाते है, गाडियों
के पीछे दौड़ कर लटकते है। जिसकी वजह से अकसर दुर्घटनाओं का शिकार भी हो जाते है।
इन इलाके में पर्याप्त अच्छे स्कूल हो तो, शायद
ही कोई अपने बच्चे का जीवन जोखिम में डालकर दूसरें इलाकों में भेजे।
·
ऐसी
ही एक घटना ने मुझें इस शोध के विषय पर सोचने को विवश किया।
·
इस
क्षेत्र में एक सरकारी एमसीडी प्राथमिक स्कूल है। जिसकी दूरी आधे से अधिक सोनिया
विहार के लिए शिक्षा अधिकार अधिनियम में तय एक किलोमीटर के दायरे से अधिक है। एक
माध्यमिक सह उच्चमाध्यमिक स्कूल तो है। इसकी दूरी शेष सोनिया विहार के लिए शिक्षा
अधिकार अधिनियम में तय तीन किलोमीटर के दायरे से अधिक है। परिणाम लोग अपने बच्चों
को मान्यता प्राप्त गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों में भेजने को विवश है।
·
निजी
स्कूलों में 5-6 प्राथमिक सह/या माध्यमिक सह/या उच्यमाध्यमिक स्कूल ही सरकार द्वारा मान्यता
प्राप्त है। शेष बीना मान्यता के ही चल रहे है। सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त,
प्राथमिक, माध्यमिक सह उच्यमाध्यमिक स्कूल है। पर ये सभी स्कूल मिल कर भी दो एमसीडी
सीट देने वाले इस क्षेत्र की आबादी की जरूरत को पूरा नहीं कर सकते। परिणाम हिसाब
से पूर्णतः अप्रयाप्त है।
तो अब सवाल यह उठता है कि क्या
ऐसी अवस्था में कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा अधिकार प्राप्त
हुआ??
Ø यदि पर्याप्त संख्या में बेहतर गुणवता के हर पुस्ते, हर ब्लाक में पहली से आठवीं
कक्षा तक के सरकारी स्कूल हो तो, शायद ही इस इलाके का कोई व्यक्ति अपने बच्चों को
निजी स्कूलों में दाखिला दिलवाएं।
Ø
20
शिक्षकों वाले एक प्राथमिक/प्राइमरी स्कूल की क्षमता 600 विद्यार्थी की होती है। प्रशासनिक
कर्मचारी एवं प्राचार्य अतिरिक्त। इस प्रकार यदि इस इलाके में 6-14 साल के बच्चों
की संख्या यदि 1.5 लाख है तो शिक्षा अधिकार अधिनियम के नियम के अनुसार, इस इलाके
में 250 प्राथमिक/प्राइमरी स्कूलों और 5000 शिक्षकों की आवश्यकता हुई।(नोट
जनसंख्या की सही संख्या के अनुपात में स्कूल और शिक्षकों की संख्या घट और बढ़ सकती
है। ये आंकड़े आनुमान के आधार पर तैयार किया गया है।)
Ø
इसी
प्रकार 1800 विद्यार्थियों की क्षमता वाले सेकेंडरी-सह-सीनियर सेकेंडरी स्कूल में
60 शिक्षकों की आवश्यकता होती है। प्रचार्य, उप प्रचार्य एवं प्रशासनिक कर्मचारी
अतिरिक्त। यदि इस क्षेत्र में 14-18 वर्ष के बच्यों की संख्या 75,000 है तो, इस
प्रकार इस इलाके में 35 सेकेंडरी-सह-सीनियर सेकेंडरी स्कूलों एवं 2000 शिक्षको की
आवश्यकता है।
अतः इस क्षेत्र
क लोगों की तरफ से हम केन्द्र सरकार, राज्य सरकार और एमसीडी से अनुरोध है
कि
ü इस इलाके में जनसंख्या के अनुपात में 250 माध्यमिक (600
विद्यार्थी क्षमता वाले), 35 उच्चमाध्मिक विद्यालय(1800 विद्यार्थी क्षमता वाले)
खोले जाए।
ü 30विद्यार्थियों
:1शिक्षक के अनुपात में अहर्तायुक्त एवं सीटेट पास
शिक्षकों की नियुक्ति की जाए। और इस बात का निजी एवं सरकारी विद्यालयों के लिए
कड़ाई से पालन किया जाए।
ü उच्चमाध्यमिक विद्यालयों में विज्ञान, वाणिज्य, मानविकी
सभी विषयों के लिए विकल्प उपलब्ध हो।
ü कम से कम चार आई.टी.आई एवं वोकेशनल ट्रेनिंग सेण्टर खोले
जाए।
ü इस इलाके में इस क्षेत्र के युवाओं के लिए कम से कम एक
कॉलेज खोला जाए।
नोट:-जनसंख्या संबंधित आकड़े विकिपीडिया एवं अन्य
स्रोत्रों से है। लेखक का इस विषय पर कोई व्यक्तिगत सर्वे नहीं है। जनसंख्या की
सही संख्या के अनुपात में स्कूलों और शिक्षकों की संख्या घट और बढ़ सकती है। मुख्य
बात यह है कि शिक्षा अधिकार अघिनियम में तय शिक्षक विद्यार्थी अनुपात के अनुरूप
शिक्षक एवं स्कूल उपलब्ध करवाएं जाएं।

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