अश्विनी कुमार 'सुकरात'
जनभाषा जनशिक्षा  जनचेतना अभियान,
नई दिल्ली
09/03/2015
सेवा में,
माननीय संसद C/o राष्ट्रपति,
एवं माननीय राष्ट्रपति महोदय,
माननीय प्रधानमंत्री महोदय एवं कैबिनेट,
एवं लोकसभा अध्यक्ष(लोकसभा के सदन के पटल पर रखने हेतू) एवं लोकसभा याचिका समिति,
एवं राज्यसभा सभापति(राज्यसभा के सदन के पटल पर रखने हेतू), एवं लोकसभा याचिका समिति,
एवं नेता प्रतिपक्ष(लोक सभा),
एवं नेता सत्ता सत्ता पक्ष (राज्य सभा),
एवं नेता विरोधी पक्ष(राज्य सभा),
एवं समस्त सांसद,
संसद/राष्ट्रपति भवन/प्रधानमंत्री कार्यालय,
दिल्ली 110001 (भारत) 
महोदय,
खुला पत्र / ज्ञापन
मानसिक गुलामी को बनाए रखने वाले तंत्र के रूप में इंग्लिश मीडियम सिस्टम
राष्ट्रपति,संसद, प्रधानमंत्री से मानसिक गुलामी से आजादी की गुहार
विषय:-भारतीय समाज को मानसिक गुलामी से मुक्त करने, शिक्षा को अंग्रेजी माध्यम के बोझ से  मुक्त कर परिवेश की भाषाओं में केजी से पीजी/पीएच़डी तक समान-सार्थक औपचारिक शिक्षा व्यवस्था, कानून-न्याय व्यवस्था और रोजगार व्यवस्था को लागू कराने की मांग को लेकर संविधान के अनुच्छेद 348, 343(1)&(2), 351,147 समेत सम्पूर्ण 17वें अध्याय में व्यापक संशोधन की मांग
माननीय एवं सम्मानीय महोदय,
श्रीमान, इस विषय पर मेरे द्वारा माननीय राष्ट्रपति,माननीय प्रधानमंत्री एवं संसद लिखा गया ये सातवां पत्र है । प्रधानमंत्री कार्यालय ने मेरे दूसरे पत्र को मानव संसाधन मंत्रालय को भेजा, मानव संसाधन मंत्रालय ने आगे एन.सी.इ.आर.टी. को भेजा, आपकी कृपा द्वारा स्थापित इस संस्था ने मेरे द्वारा लिखे पत्र  के पक्ष में रिपोर्ट आपके मंत्रालयों को भेजी जिसकी एक कॉपी मुझें भी भेजी गयी पर बडे ही खेद की बात है कि अब तक न तो माननीय प्रधानमंत्री ने, ही न ही उनके मंत्रालय ने इस विषय पर कोई कार्यवाही की और न ही संसद के पटल पर ही इस विषय को चर्चा हेतू ही  रखा । आपसे अनुरोध है कि इस बजट सत्र में इस विषय पर चर्चा करवाये संविधान में यथोचिच संशोधन करवाये । पूर्व में भेजे गये समस्त पत्रइसी विषय पर लिखी गयी शोध आधारित पुस्तक इंग्लिश मीडियम सिस्टम दैट इज अंग्रेजी राजके निष्कर्ष बिन्दु में संग्रहित है । वह बुकलेट इस पत्र के साथ संलग्न है ।
अभी जाट आरक्षण की मांग को लेकर हरियाणा धू-धू कर जला । कुछ दिनों पहले यही हाल गुजरात का था । जहाँ पाटीदारों ने आरक्षण की मांग को लेकर पूरा गुजरात ठप कर दिया था । उससे पहले राजस्थान में एस.टी. आरक्षण को लेकर गुज़र और मीणा आमने सामने थे । लेकिन सवाल यह उठता है कि भारतीय संविधान  के रचनाकारों द्वारा तदर्थ-व्यवस्था के रूप में की गयी आरक्षण की व्यवस्था के दायरे को बढ़ाएं जाने की मांग क्यों हो रही है ? क्या आरक्षण ने जाति विशेष के लोगों को कुछ फायदा दिया भी है ? या इसका सारा फायदा जाती  विशेष के उच्च पायेदानों पर विराजित वर्ग तक ही सिमटा कर रहा गया ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में कृषि एवं श्रम अधारित व्यवसाय के लोग/जातियाँ क्यों पिछड़ रहीं है ? क्या कारण है कि उच्च वर्ण के उच्चवर्ग का ही शिक्षा और नैकराशाही में दबदबा है ?  क्या कारण है कि  भारत के ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े लोग शिक्षा के क्षेत्र में पिछडते जा रहे है ?
महोदय,  इस देश का सबसे बड़ा आरक्षण है- अंग्रेजी का आरक्षण । जो आईआईटी, आईआईएम, डी-स्कूल, युपीएससी, डीएसएसएसबी आदि की 95% सीटों को  अंग्रेजीदां वर्ग के लिए आरक्षित करता है । अंग्रेजी की अनिवार्यता एक तरफ देश के ग्रामीण, कस्बाई, निम्न मध्यम वर्ग को पीछे धकेलने  का काम करती है, तो दूसरी तरफ सभी जाति और मजहब के उच्च वर्ग को जैक प्रदान करती है ।
माननीय,आखिर किसके हितों को साधने हेतू दलील सिर्फ अंग्रेजी में ही हो सकती है ? स्पष्ट करे:-

जी हाँ! अंग्रेजी की अनिवार्यता अर्थात अंग्रेजों के समय मे तैयार मैकाले के मानसपुत्रों का व्यवस्था में आरक्षण

अंग्रेजों के समय से ही भारतीय समाज में अंग्रेजीयत का वर्चस्व अंग्रेजों द्वारा राजसत्ता में सहयोग के लिए पैदा किये के सहभागी दलाल वर्ग का सांस्कृतिक वर्चस्व रहा है। शुरूआती दौर में अंग्रेजों ने उच्च वर्ण के ब्राह्मण और कायस्तों के साथ संपर्क साधा फिर खान-पठान सेअतः अंग्रेजीदां  वर्ग में  हिन्दू, सिखऔर मुसल्मान के उच्च वर्ण के वर्चस्वप्राप्त(खानदानी)  लोगों का ही समूह हुआ । अंग्रेजी इस वर्ग की ही सांस्कृतिक पूँजी है। यह वर्ग ही भारतीय समाज में उच्च एलिट वर्ग के रूप में स्थापित हुआ । 200 साल के अंग्रेजों के राज में, यह वर्ग ही सत्ता के हर शीर्ष पर काब़ीज भी हुआ और सत्ता 1947 में हुए हस्तांतरण के बाद भी शीर्ष पर बना रहा है । अंग्रेजी इस वर्ग का ही भाषा है । अंग्रेजीयत इस वर्ग का ही सांस्कृतिक वर्चस्व भी है । अंग्रेजी, वर्चस्व के हथियार के रूप में राजनैतिक. आर्थिक एवं ज्ञान की सत्ता को इस देश की 3% आबादी तक समेटे रखती है । अतः यह अंग्रेज़ीयत का सिस्टम ही भ्रष्टाचार, गैर-बराबरी और शोषण की व्यवस्था का संरक्षक है ।
स्कूल व्यवस्था राजसत्ता की उपव्यवस्था है। स्कूली व्यवस्था की प्रकृति वैसी ही होगी, जैसी राज सत्ता की होगी। चूँकि राज सत्ताइंग्लिश मीडियम वर्गके हाथ में केन्द्रित है और इस वर्ग का हित भाषायी गैर बराबरी को बनाए रखने में है। अतः स्कूली व्यवस्था भी बहुस्तरीय इंग्लिश मीडियमकेन्द्रित है। जब तक राजव्यवस्था गैरबराबरी की इंग्लिश मीडियमप्रकृति की रहेगी, तब तक स्कूली व्यवस्था भी गैरबराबरी की इंग्लिश मीडियमप्रकृति की ही रहेगी। और जब तक राजसत्ता की तानाशाही इंग्लिश मीडियम वर्गके हाथ तक सिमटा रहेगा, तब तक लोकतंत्र पांच साल में होने वाले तमासे से ज्यादा कुछ नहीं होगा । जनवाद के नाम पर लोग पाँच साल में एक बार अंगुली काली तो करवाएगें, जाति, मजहब और क्षेत्र जैसे संक्रीर्ण मुद्दों पर लड़ेगे और फिर उसी इंग्लिश मीडियम सिस्टमका शोषण, दमन और भ्रष्टाचार झेलेगें । अमीर को अदालते पिछले दरवाजे से जमानते देगी । गरीब व्यक्ति पैरवी न कर पाने की वजह से जेलों में सड़ते रहेगे । इंग्लिश मीडियम शिक्षाव्यवस्था स्तरीकरण के हथियार के रूप में इंग्लिश मीडियम राजव्यवस्थाके प्रति वफादार लोगों को ही इंग्लिश मीडियम सिस्टममें स्थान देती है। इंग्लिश मीडियम राजव्यवस्था’ ‘इंग्लिश मीडियम शिक्षाके माध्यम से ही अपने आप को सुरक्षित रखने का घेरा तैयार करती है।
इंग्लिश मीडियम एजुकेशन व्यवस्था के दास के रूप में देश के सभी जाति, मजहब और क्षेत्र की ग्रामीण, कस्बाई, निम्न एवं निम्न मध्यमवर्गीय आबादी को मुख्यधारा से दूर रख सत्ता के शीर्ष को उच्चवर्गीय एलीट क्लास के लिए आरक्षित रखता है। यूपीएससी, आईआईटी, एम्स, आईआईएम और तमाम अति विशिष्ट माने जाने वाले विश्वविद्यालय जैसे जेएनयू डीयू., ये सभी के सभी संस्थान अंग्रेजीयत के सामाजिक वर्चस्व का साँस्कृतिक बोध पैदा करने का ही काम करते है। अंग्रेजीदां बनने की चाह ने इस देश को अपने मोहपाश में इस कदर जकड़ा रखा है कि समाज का हर तबका अपना सब कुछ दांव पर लगा कर अपनी भाषा का शुद्धिकरण की चाह रखता है। भोजपुरी, मैथली, बांगड़ी बोलने वाले बैकवर्ड कहलाएंगे और दो लाईन अंग्रेजी में गिट-पिटाए नहीं कि मॉर्डन हो जाएंगे। अंग्रेजीदां बन हर कोई गिट-पिटाना चाहता है, पर यह अंग्रेजी ही इस देश की 95 प्रतिशत ग्रामीण, कस्बाई, निम्न एवं निम्न मध्यमवर्गीय मेहनतकश तबके को व्यवस्था से दूर रखने का काम करती है। .. और साथ यह ज्ञान, पूँजी, नौकरशाही, राजनीति के शीर्ष को 3 प्रतिशत ऊपरी तबके तक के लिए सुरक्षित भी रखती है। बस यहीं से भ्रष्टाचार’, ‘शोषण’, ‘गैरबराबरीगड़बड़ झाला शुरू होता है। अंग्रेजीयत ही भ्रष्टाचार’, ‘शोषण’,  ‘गैरबराबरीके साँस्कृतिकरण करने का काम करती है। अंग्रेजी को सिर्फ़ भाषा समझना उसकी ताकत को कम कर आंकना है। अंग्रेजी सिर्फ़ भाषा नहीं भारतीय समाज में वर्चस्व का बोध भी है।
लोकतंत्र में शासन में जनता की सहभागिता तभी आ सकती है जब शासन व्यवस्था जन-भाषाओं में संचालित हो। भारत में कहने के लिए लोकतंत्र है । पर इंग्लिश मीडियम सिस्टमकी वजह से शासन प्रशासन के स्तर पर क्या घोल-मेल होता है यह जनता के समझ के बाहर है। जनता न तो मूलतः अंग्रेजी में लिखे कानून को समझ पाती है, न ही उसके आधार पर चलने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया को और न ही उसके कलिष्ट हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में हुए अनुवाद को ही । उच्च शिक्षा का ज्ञान उच्च वर्ग तक ही सिमट कर रह गया है। भगत सिंह ने कहाँ था कि क्रांति की तलवार विचारों की शान पर चलती है। .. और साथियों मौलिक विचार अपने परिवेश की बोली भाषा में ही प्रतिष्फुटित होते है। बच्चा हो या बड़ा, हर एक अपने परिवेश की बोली में ही अपने आप को सहजता से अभिव्यक्त कर पाता है। मातृभाषा परिवेश पर निर्भर करती है न कि मजहब़, वंश, जाति आदि पर । अंग्रेजी जैसी गैर परिवेश की भाषा में तो बस हम रटी रटायी बात ही उगल सकते है। मौलिक चिंतन नहीं कर सकते है। इंग्लिश मीडियम सिस्टमने के.जी. से पी.एचडी. तक की सम्पपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को तोता तैयार करने की फैक्ट्री में तब्दील कर दिया है। जिस से निकला तथाकथित शिक्षित वर्ग रटी रटाई बातो को ही उगलता है।**
जनभाषाओं में ही जन जागृति संभव है । औपचारिक शिक्षा(स्कूल-कॉलेज) और अनौपचारिक शिक्षा(समाजिक-सांस्कृतिक जनसंपर्क) में परस्पर संवाद से ही मौलिक ज्ञान का सृजन होता है । परिवेश के बाहर की भाषा जैसे अंग्रेजी में रटा-रटायी बात ही उगल सकते है । फिर समाज के किस वर्ग के हितों की रक्षा के लिए संविधान के अनुच्छेद 348 के तहत भारत में अंग्रेजी के वृक्ष को रोपा गया है? जिसे सिचने का काम संविधान के अनुच्छेद 343(1) &(2), 351, 120, 210 आदि करते है?मेक इन इंडियाकार्यक्रम के तहत भारत को आर्थिक एवं तकनिकी सहायता प्रदान करने वाले तमाम देश चीन, जपान, बैल्जियम, स्वीडन, जर्मनी, अपने-अपने देश की भाषाओं में ही शिक्षा राजव्यवस्था का संचालन करते हो तो भारत के साथ दिक्कत क्या है ??? भारत में शिक्षाव्यवस्था की सारी उर्जा अंग्रेजी माध्यम की व्यवस्था को बनाने में ही क्यों लगा दिया गया है?? जब ये देश दूनिया में किसी भी भाषा में छपे दस्तावेज का अनुवाद स्व भाषा में कर अपने देशवासियों को उपलब्ध करा सकते है। तो दुनिया के किसी भी हिस्से का ज्ञान इंडिया दैट इज भारत में वाया लंदन एवं वाशिंगटन ही क्यों आता है? कही ऐसा तो नहीं, इस तथाकथित विश्वभाषा इंग्लिश ने हमें शेष विश्व से ही काट दिया है? शेष विश्व का वह ही ज्ञान भारत आ सकता है जिसे ये दो मख्य अंग्रेजी भाषी देश ज्ञान मानते हो। दूसरा मूल भाषा से अंग्रेजी मे अनुवाद के दौरान यदि कोई त्रुटी हो जाए तो वह उससे कलिष्ट रूप में आगे संचयी होगी । मतलब, वह ही ज्ञान भारत की सर जमी तक आएगा । ये दो देश ज्ञान मानेगों। वह भी अधकचरे तरिके से। अंग्रेजो द्वारा मूलनिवासियों का सफाया कर बसाये गये देशों को छोड दे तो 2% से भी कम जनसंख्या इस तथाकथित विश्वभाषा को समझ पाती है। तो आखिर भारत में तथाकथित विश्वभाषा का सिफुगा क्यों फुका गया है???
जब तक शासन प्रशासन और न्याय की भाषा सर्वहारा-गरीब-जन की भाषा नहीं होगी , तब तक यह व्यवस्था सर्वहारा-गरीब-जन का यु ही दमन करती रहेगी। जब सर्वहारा(गरीब वर्ग) की भाषा ही नहीं रहेगी तो सर्वहारा के विचार भी नहीं रहेगे। अब जब कांग्रेसी एवं भाजपायी आदि ही नहीं सभी कामरेड(सर्वहारा वर्ग के तथाकथित नेता) जन भाषा(सर्वहारा-गरीब जन द्वारा बोले एंव समझे जाने वाली बोली-भाषा) के मुद्दे पर मौन ही नहीं, अपितु आम जन के समझ से परे की भाषा अंग्रेजी की पैरवी में ही लगे है। ऐसे में जन भाषाओं के प्रति हमारी प्रतिबधता भगत सिंह को फिर से जिन्दा करने की जिद्द है। चर्चा परिचर्चा का हिस्सा बनने के लिए शामिल हो ।
आइये! मानसिक रूप से गुलाम बनाने वाले भाषायी मिथ से पर्दा हटाएं ।
भारतीय समाज में अंग्रेजी सिर्फ भाषा नहीं, वर्गीय विभाजन को बनाए रखने का व्यवस्था-जनित साँस्कृतिक हथियार भी है ।
माननीय महोदय, जन समान्य की बोली-भाषा में ही जन-समान्य की चेतना को जागृत करने वाली शिक्षा संभव है। नकि, देश के बाहर की भाषा अंग्रेजी में । जन-जन के शिक्षित होने पर ही जन चेतना जागृत होगी। जागृत जन से ही जन क्रांति का प्रतिष्फुटन होगा ........ स्पष्ट है जन भाषा में ही जन वाद संभव है । जन वाद से जनतंत्र.........जन भाषा के बीना जन तंत्र लुटतंत्र से अधिक कुछ नहीं..
मौलिक चिंतन परिवेश की भाषा में ही संभव है, मौलिक चिंतन से ही मौलिक ज्ञान का सृजन होता है। परिवेश के बाहर की भाषा में तो रटा ही जा सकता है। मौलिक ज्ञान वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पैदा करती है । वैज्ञानिक ज्ञान चेतना को जागृत करता है । चेतना ही समाज और परिवेश के भौतिक संबंघ को संझनें में सहायक है । चेतना की तीसरी आँख के खुलने पर ही व्यक्ति परिवेश के भौतिक संबंधों को समझ उसके परिवर्तन के लिए संघर्ष करता है । वैज्ञानिक ज्ञान से ही व्यक्ति में नवसृजन एवं परिवर्तन करने की काबलियत पैदा होती है । उत्पादन करने की क्षमता ही रोजगार की गारेंटी है।
दुनियाभर के श्रेष्ठ शिक्षाविदों के साथ शिक्षा पर शोध करने वाली एनसीईआरटी के अनुसार भी बच्चों के सीखने का सर्वोत्तम माध्यम बच्चे के परिवेश की भाषा ही है। संविधान का अनुच्छेद 350क भी प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था की बात करता है। पर इसके बावजूद गली-गली में इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल रहे है। हमारे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी माता पिता को स्कूली शिक्षा माध्यम को चुनने के फैसले को देने वाले निर्णय में माना कि बच्चे के सीखने का सर्वोत्म माध्यम मातृभाषा ही है। पर लोग, माननीय सर्वोच्च न्यायालय की इस नेक नसीहत को नजर अंदाज करते हुए अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में ठूस रहे है। अभिभावक चाहे महल का हो या स्लम का, हर एक की पहली पसंद इंग्लिश मीडियम स्कूल हो गयी है। परिणाम आज गली-गली में इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल रहे है। पर सवाल यह पैदा होता है कि इस इंग्लिश मीडियम शिक्षा व्यवस्था में बच्चे कुछ सीख भी पाते है ? साथियों ! शिक्षा का अर्थ मनुष्य की चेतना को जागृत कर ज्ञान को व्यवहारिक बनाना है। वही हमारे बच्चे बीना व्यवहारिक अर्थ समझें रटते चले जाते है। वे रट-रट कर केजी से पीजी तक पास कर जाते है। पर मौलिक ज्ञान सृजन नहीं कर पाते। यह अंग्रेजी माध्यम व्यवस्था का ही परिणाम है कि हमारे विद्यार्थियों की पढ़ने की रूचि पाठ्यपुस्तक तक ही सिमट कर रह गयी है। हमारे बच्चों ने रटनेको ही ज्ञानसमझ लिया है और अंग्रेजी बोलने की योग्यता को (इंग्लिश स्पीकिंग)को ही शिक्षा। विद्यार्थी वर्ग आज सिर्फ उतना पढ़ता है जितना की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए काफी है। डिग्री ही ज्ञान है इसका परिणाम यह निकला है कि डिग्री प्राप्त करों-  चाहे रटों, नकल करों या खरीद लो। - इंग्लिश मीडियम शिक्षा की बदौलत शिक्षित नहीं कुशिक्षित हो रहा है- हमारा समाज । हमारे बच्चे स्कूल में रटे ज्ञान का स्कूल के बाहर के बाहर की दूनियां के साथ तालमेल नहीं बैठा पाते । ये अंग्ररेजी का ही परिणाम है कि हमारे बच्चे रेव पार्टियों, उदंडता एवं अशिष्ट प्रवितृ का शिकार होते जा रहे है। हमारे बच्चे मानक भाषा ही सीखे इसके लिए आज हमारे घरों में हमनें अपनी बोली में बात-चीत करना तक बंद कर दिया है। अंग्रेजीदां बनने की चाह ने इस देश को अपने मोहपाश में इस कदर जकड़ा रखा है कि समाज का हर तबका अपना सब कुछ दांव पर लगा कर अपनी भाषा का शुद्धिकरण चाह रहा है। भोजपुरी, मैथली, बांगड़ी बोलने वाले बैकवर्ड कहलाएंगे और दो लाईन अंग्रेजी में गिट-पिटाए नहीं कि मॉर्डन हो जाएंगे। अंग्रेजीदां बन हर कोई गिट-पिटाना चाहता है। पर वह यह नहीं जानता की 100 में से 99.99% इसमें असफल ही होगे । यह अंग्रेजी ही इस देश के लोगों को शिक्षा, न्याय और रोजगार से दूर रखने का काम करती है। माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में माना कि देश की आम जनता कोर्ट की इस नास़ीफ भाषा- अंग्रेजी को नहीं समझ पाती । कोर्ट में आज अनेकों मामले अंग्रेजी की वजह से लंबित पड़े है और हजारों लोग सिर्फ सिर्फ वकीलों का मुहँ ताकने को मजबूर है। अंनुच्छेद 348 के अनुरूप माननीय उच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी होने की वजह से तमाम संवैधानिक एवं उच्च पदों की भाषा भी अंग्रेजी हो जाती है। इसका परिणाम यह निकलता है कि अधिकारी से लेकर चपड़ासी तक के सभी पदों में अंग्रेजी का घुसपैठ हो जाता है। जैसा पद वैसी अंग्रेजी । ये रोजगार के अवसरों में अंग्रेजी की अनिवार्यता ही है जिसने हर एक को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए मजबूर किया है। हमारे देश की संविधान निर्माताओं ने अंग्रेजी को एक अल्प अवधि के लिए ही लागू किया था । उन्हें अनुमान था कि संविधान लागू होने के 15 वर्ष के अन्दर हिन्दी देश के सभी राज्यों में स्वीकार कर ली जाएगी और फिर देश में काम काज की भाषा अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी हो जाएगी । पर तमिलनाडु में हुए विरोध के चलते हिन्दी कामकाज की अधिकारिक भाषा नहीं बन पायी । तमिलनाडु आज भी तमिल को उच्चन्यायालय की अधिकारिक भाषा बनवाने के लिए तरस रहा है। अंग्रेजी व्यवस्था की वजह से भारत में कहने भर को लोकतंत्र रह गया है। पर इंग्लिश मीडियम सिस्टमकी वजह से शासन प्रशासन के स्तर पर होने वाली कार्यवाही जनता के समझ के बाहर है। जनता न तो मूलतः अंग्रेजी में लिखे कानून को समझ पाती है, न ही उसके आधार पर चलने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया को और न ही उसके कलिष्ट हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में हुए अनुवाद को ही । शोध आधारित विशलेषण के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि भारतीय संविधान की धारा 348 की वजह से ही गली-गली में अंग्रेजी माध्यम के अधकचरे स्कूल खुल रहे है। बच्चा हो या बड़ा, हर एक अपने परिवेश की बोली में ही अपने आप को सहजता से अभिव्यक्त कर पाता है। मातृभाषा परिवेश पर निर्भर करती है न कि मजहब़, वंश, जाति आदि पर। अंग्रेजी जैसी गैर परिवेश की भाषा में तो बस हम रटी रटायी बात ही उगल सकते है। मौलिक चिंतन नहीं कर सकते है। इंग्लिश मीडियम सिस्टमने सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को तोता तैयार करने की फैक्ट्री में तब्दील कर दिया है। जिस से निकला तथाकथित शिक्षित वर्ग रटी रटाई बातो को ही उगलता है। जिस तेजी से अंग्रेजीयत का काला साया हमारे समाज पर पसर रहा है, उसका आने वाले 10-15 सालों में प्रभाव यह निकलने वाला है कि का’,’कीजैसे शब्दों के अलावा कोई भी शब्द भारतीय सांस्कृतिक बोलियों के नहीं रह जाएगे । भारतीय भाषाओं के शब्दकोश अजायब घर में रखे जाने वाली विलुप्त धरोहर भर बन कर रह जाएगी । रोम और युनान की तो सभ्यताएं ही मिटी पर यहाँ तो पूरी की पूरी संस्कृति ही विलुप्त होने के कगार पर खड़ी है। (नोट:- संस्कृति = संचित ज्ञान )
अतः राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री (भारत सरकार) एवं संसद(राष्ट्रपति, लोकसभा एवं राज्य सभा के समस्त सांसद) अनुरोध है कि संविधान में निम्न संशोधन किए जाए :-
I.          343(1) हिन्दी के स्थान पर समस्त भारतीय जन-भाषाएं(भाषा एवं बोलियाँ) 343(1) धारा हिन्दी को राजभाषा घोषित करती है जिसे भ्रम वस लोग राष्ट्रभाषा भी समझ लेते है। इस धारा का महान योगदान यह है कि इसने हमारे देश को हिन्दी गैर हिन्दी नामक दो कृत्रिम राष्ट्रियताओं में विभक्त कर दिया है। या यु कहे कि भाषा और क्षेत्र के आधार पर अनेकों राष्ट्रियताओं को पैदा कर दिया है। हिन्दी राष्ट्रभाषा है कि नहीं’,  हिन्दुतानी भाषा-भाषी की आपसी इस लड़ाई में संविधान की धारा 343(2) के माध्यम से अंग्रेजी का वर्चस्व स्थापित हो जाता है। एक रोज हिन्दी को पूरा देश स्वीकार करेगा उस रोज हिन्दी अंग्रेजी का स्थान लेगी, यह एक ऐसी मिथक कल्पना है, जो कभी पूरी होती नहीं दिखती । हम आपसे पूछते है कि यदि हिन्दी राष्ट्रभाषा है तो तमिल, तेलगू, कश्मीरी, गुजराती, बंगाली आदि क्या गैर राष्ट्र भाषा है ? सच्चाई तो यह है कि हिन्दी को राजभाषा बनाने वाली संविधान की धारा 343(1) की वजह से ही गैर हिन्दी परदेशों में हिन्दी के प्रति नफरत पनपी है। वर्ना समस्त भारतीय भाषाओं के मिश्रण से हिन्दुस्तानी-फेविकोल’(अमीर खुसरों से लेकर गांधी तक की मिली जुली हिन्दुस्तानी) तैयार होने की प्रबल संभावना है। आज हमें दो में से एक को चुनना है। एक भाषा अनेक देश । अनेक भाषा एक देश । हमारी संस्कृति विविधता में एकता की है। अतः 343(1) के स्थान पर भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूचि में शामिल समस्त भारतीय भाषाएं । एवं आठवीं अनुसूचि में समस्त भारतीय बोली-भाषाओं को शामिल किया जाए ।
II.         हिन्दी-उर्दू को एक भाषा माना जाए । लिपी भाषा नहीं होती है। लिपियांत्रण को बढ़ावा दिया जाए । समस्त भारतीय लिपियों में भी हिन्दी-उर्दू/हिन्दवी/हिन्दुस्तानी आदि को लिखा जाए एवं उसके विपरीत भी । देवनागरी/रोमन/फारसी/ समेत समस्त भारतीये लिपियों का इस प्रकार विस्तार किया जाए कि भारत की सभी भाषाओं को एक से ज्यादा लिपियों लिखा जा सके । 

III.     भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(2) एवं 348 के प्रवाधान से अंग्रेजी के स्थान पर समस्त भारतीय भाषाओं (आठवीं अनुसूचि) को शामिल किया जाए । त्वरित न्याय के लिए देश के हर एक जोन में सर्वोच्च न्यायालय स्थापित हो  जो उस क्षेत्र में बोली जाने वाली सभी बोलियों में न्याय की व्यवस्था करे । सभी राज्यों के उच्चन्यायालय अनिवार्यतः उस राज्य में बोली भाषाओं में ही कामकाज करे । हर राज्य में सर्वोच्च न्यायालय की शाखा खोली जाए । जो उस राज्य की बोली भाषा में काम काज करे ।
IV.    हिन्दी-उर्दू अर्थात हिन्दवी/हिन्दुस्तानी का काम भारत की समस्त भाषाओं में समन्वय का हो । पर किसी भी भाषा को थोपे न । परिवेश के अनुरूप इस मिली जूली हिन्दूस्तानी के कई-कई स्वरूप उत्पन्न हुए है। जैसे मराठी-हिन्दी-उर्दू-संस्कृत/हिन्दवी/हिन्दुस्तानी(मुम्बईया-हिन्दी),  गुजराती-हिन्दी-उर्दू-संस्कृत/हिन्दवी/हिन्दुस्तानी, तमिल-हिन्दी-उर्दू-संस्कृत/हिन्दवी/हिन्दुस्तानी, नागामीश-हिन्दी-उर्दू-संस्कृत/हिन्दवी/-हिन्दुस्तानी, आदि । भाषा नदियों के समान होती है। नदी में पानी के बहाव की दर में परिवर्तन आता रहता है, वैसे ही भाषा में भी परिवर्तन आता रहता है। संगम पर दो नदियों की धारां अलग अलग जान पडती है पर मिल कर एक विशाल नदी का रूप ले लेती है। सरकार भाषाई मामले में हस्तक्षेप न करे तो भारत की भाषाओं को मिल कर एक होने की प्रबल संभावना है। अतः अनुच्छेद 351 में संशोधन हो । भारत सरकार हिन्दी के प्रसार की जगह सरकार हम भारत के लोगों की मिली जुली भाषा को अपना ले । शब्द किसी भाषा विशेष की बपौती नहीं होते है। भाषीक परिवेश में जाकर शब्द उसके अनुरूप ढ़ल जाते है। अतःअंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं से आये तकनिकी शब्दों को अपनाया जाए । राजभाषा विभाग जबरदस्ती का हिन्दी अनुवाद एवं कृत्रिम हिन्दी को पैदा करने का काम बंद कर दे और समस्त राजभाषा अधिकारियों को वीआरएस दिया जाए । सरकार से विशेष अनुरोध है कि राजभाषा विभाग को तुरंत से तुरंत बंद कर दिया जाए।
V.       अनुच्छेद 147 को समाप्त किया जाए । जो ब्रिटेन की संसद के द्वारा 1947 से पूर्व पास किये गये कानूनों को ही मान्य नहीं करता अपितु अंग्रेजों के समय की व्यवस्था को भी बनाए रखता है।
VI.     केजी से पीएचडी तक परिवेश की बोली-भाषा माध्यमों में समान समान स्कूली और विश्वविद्यालयी शिक्षा एवं रोजगार का अधिकार नागरिकों को दिया जाए । वर्तमान शिक्षा बोर्डों को भंग कर, संकुन के सिद्धान्त पर सांस्कृतिक शिक्षा बोर्ड सह विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाए ।
VII.  पीएससी, एसएससी, डीएसएसएसबी समेत सभी रोजगार के लिए नैकरियों की परीक्षा का आयोजन करने वाली संस्थाएं अपनी परीक्षाओं का आयोजन अनिवार्यतः भारतीय जनभाषाओं में ही करे।अंग्रेजी की अनिवार्यता पूर्णतः समाप्त की जाए। आईआईटी, आईआईएम समेत समस्त बेहतर माने जाने वाले उच्च शिक्षा संस्थानों/विश्वविद्यालयों की परीक्षा ही नहीं अपितु शिक्षा भी हो भारतीय भाषा माध्यमों में ही हो तथा इन संस्थाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता अर्थात अंग्रेजी का आरक्षण पूर्णतः समाप्त हो ।
VIII.        जब तक भाषाई समता नहीं आ जाती है। तब तक गैर-अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों  को अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों के समतुल्य लाने के लिए सभी प्रकार की विश्वविद्यालयी एवं प्रतियोगिता परीक्षाओं गैर-अंग्रेजी भारतीय भाषा माध्यम से परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों/अभ्यार्थियों हर प्रकार की परीक्षा में 5% का अतिरिक्तांक  दिये जाए । विश्वविद्यालय एवं सरकारी सेवाओं की 75% सीटे सरकारी स्कूलों एवं गैर-अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने एवं परीक्षा देने वाले भारतीये भाषा के विद्यार्थियों के लिए अनिवार्यतः आरक्षित की जाए। एक भाषा परिवेश से दूसरे भाषा परिवेश में जाने पर विद्यार्थी को  उस भाषा परिवेश  के विद्यार्थियों के समतुल्य लाने हेतु अतरिक्तांक भी दिया जाए ।
माननीय महोदय, या तो भारत की संसद ये संशोधन लाए और अंग्रेजी के विशेषाधिकार को हटाए अथवा मुझ पर देश द्रोह का मुकदमा चलाए । मैं अलगाववाद का समर्थन नहीं करता हूँ। पर कनैहया कुमार का नारा आज इस पत्र के माध्यम से मैं भी दोहराता हूँ । हम भारत दैट इज इंडिया से स्वतंत्र होने की वकालत नही करते । परन्तु भारत को इंडिया से आजाद करने की मांग जरूर रख रहे है । यदि इस समस्या को समय रहते हल नहीं किया तो भविष्य में यह विषय भी गृह युद्ध का कारण हो सकता है । आज आपकों तय करना है एक देश अनेक भाषाएं या एक भाषा अनेक देश ।

हमे चाहिए आजादी !, आजादी भई आजादी !!
मानसिक गुलामी से आजादी!, भाषाई भेदभाव से आजादी!!,
अंग्रेजीदां वर्ग के वर्चस्व से आजादी ! आजादी भई आजादी!!!
अंग्रेजीदां वर्ग के आरक्षण से आजादी
अंधविश्वास एवं अन्धानुयायिता को बढ़ावा देने वाले
इंग्लिश मीडियम एजुकेशन’ से आजादी,
शोषणभ्रष्टाचार और गैरबराबरी को बनाए रखने वाले 
इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ से आजादी!
मानसिक गुलामी से आजादी ! आजादी भई आजादी !!
आजादी भई ! आजादी !

आपका साथी एवं सहयोगी
अश्विनी कुमार 'सुकरात'
 फेसबुकएवं एवं वाट्सअप संपर्क करने हेतू फोन 9210473599, 9990210469
जन भाषा – जन शिक्षा – जन चेतना – अभियान
(भाषाई, शिक्षाई एवं व्यवस्थागत विषमताओं को समाप्त करने हेतु अभियान)
इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ =  काले अंग्रेजों काअंग्रेजी राज’ = ‘भ्रष्टाचार’, ‘शोषण’, ‘गैरबराबरी’  की व्यवस्था पर साँस्कृतिक ठप्पा
फेसबुक/व्हाट्सअप/मोबाइल फ़ोन संपर्क हेतु नंबर - 921047599

Comments

Popular posts from this blog

अंग्रेजी माध्यम राज व्यवस्था का परिणाम - अंग्रेजी माध्यम विद्यालय