अंग्रेजी की अनिवार्यता अर्थात अंग्रेजों के समय मे तैयार मैकाले के मानसपुत्रों का व्यवस्था में आरक्षण
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साथियों ! अभी जाट आरक्षण की मांग को लेकर हरियाणा धू-धू कर जला । कुछ दिनों पहले यही हाल गुजरात का था । जहाँ पाटीदारों ने आरक्षण की मांग को लेकर पूरा गुजरात ठप कर दिया था । लेकिन सवाल यह उठता है कि भारतीय संविधान  के रचनाकारों द्वारा तदर्थ-व्यवस्था के रूप में की गयी आरक्षण की व्यवस्था के दायरे को बढ़ाएं जाने की मांग क्यों हो रही है ? क्या आरक्षण ने जाति विशेष के लोगों को कुछ फायदा दिया भी है ? या इसका सारा फायदा जाती  विशेष के उच्च पायेदानों पर विराजित वर्ग तक ही सिमटा कर रहा गया ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में भू-संपत्ति के मामले में ताकतवर रही जातियाँ क्यों पिछड़ रहीं है ? क्या कारण है कि उच्च वर्ण के उच्चवर्ग का ही शिक्षा और नैकराशाही में दबदबा है ? क्या कारण है कि  भारत के ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े लोग शिक्षा के क्षेत्र में पिछडते जा रहे है ? साथियों ! इस देश का सबसे बड़ा आरक्षण है अंग्रेजी का आरक्षण । जो आईआईटी, आईआईएम, डी-स्कूल युपीएससी, डीएसएसएसबी आदि की 95% सीटों को  अंग्रेजीदां वर्ग के लिए आरक्षित करता है । अंग्रेजी की अनिवार्यता ही वह कारण है जो इस देश के ग्रामीण, कस्बाई, निम्न मध्यम वर्ग को पीछे धकेलने  का काम कर रही है ।
अंग्रेजों के समय से ही भारतीय समाज में अंग्रेजीयत का वर्चस्व अंग्रेजों द्वारा राजसत्ता में सहयोग के लिए पैदा किये के सहभागी दलाल वर्ग का सांस्कृतिक वर्चस्व रहा है। शुरूआती दौर में अंग्रेजों ने उच्च वर्ण के ब्राह्मण और कायस्तों के साथ संपर्क साधा फिर खान-पठान से,  अतः इस वर्ग में हिन्दू और मुसल्मान के उच्च वर्ण दबदबा है । यह वर्ग ही भारतीय समाज में उच्च एलिट वर्ग के रूप में स्थापित हुआ । 200 साल के अंग्रेजों के राज में, यह वर्ग ही सत्ता के हर शीर्ष पर काब़ीज भी हुआ और सत्ता 1947 में हुए हस्तांतरण के बाद भी शीर्ष पर बना रहा है । अंग्रेजी इस वर्ग का ही भाषा है । अंग्रेजीयत इस वर्ग का ही सांस्कृतिक वर्चस्व भी है । अंग्रेजी, वर्चस्व के हथियार के रूप में राजनैतिक. आर्थिक एवं ज्ञान की सत्ता को इस देश की 3% आबादी तक समेटे रखती है । अतः यह अंग्रेज़ीयत का सिस्टम ही भ्रष्टाचार, गैर-बराबरी और शोषण की व्यवस्था का संरक्षक है ।
स्कूल व्यवस्था राजसत्ता की उपव्यवस्था है। स्कूली व्यवस्था की प्रकृति वैसी ही होगी, जैसी राज सत्ता की होगी। चूँकि राज सत्ताइंग्लिश मीडियम वर्गके हाथ में केन्द्रित है और इस वर्ग का हित भाषायी गैर बराबरी को बनाए रखने में है। जाति के आरक्षण की आड में अंग्रेजी के आरक्षण को बनाए रखा गया है । अतः स्कूली व्यवस्था भी बहुस्तरीय इंग्लिश मीडियमकेन्द्रित है। जब तक राजव्यवस्था गैरबराबरी की इंग्लिश मीडियमप्रकृति की रहेगी, तब तक स्कूली व्यवस्था भी गैरबराबरी की इंग्लिश मीडियमप्रकृति की ही रहेगी। और जब तक राजसत्ता की तानाशाही इंग्लिश मीडियम वर्गके हाथ तक सिमटा रहेगा, तब तक लोकतंत्र पांच साल में होने वाले तमासे से ज्यादा कुछ नहीं होगा । जनवाद की उम्मिद में लोग पाँच साल में एक बार अंगुली काली तो करवाएगें और फिर उसी इंग्लिश मीडियम सिस्टमका शोषण, दमन और भ्रष्टाचार झेलेगें । इंग्लिश मीडियम शिक्षाव्यवस्था स्तरीकरण के हथियार के रूप में इंग्लिश मीडियम राजव्यवस्थाके प्रति वफादार लोगों को ही इंग्लिश मीडियम सिस्टममें स्थान देती है। इंग्लिश मीडियम राजव्यवस्था’ ‘इंग्लिश मीडियम शिक्षाके माध्यम से ही अपने आप को सुरक्षित रखने का घेरा तैयार करती है।
इंग्लिश मीडियम एजुकेशनव्यवस्था के दास के रूप में देश की ग्रामीण, कस्बाई, निम्न एवं निम्न मध्यमवर्गीय आबादी को मुख्यधारा से दूर रख सत्ता के शीर्ष को  अंग्रेजों के समय मे तैयार उच्चवर्गीय एलीट क्लास के लिए आरक्षित रखता है।
यूपीएससी, आईआईटी, एम्स, आईआईएम और तमाम अति विशिष्ट माने जाने वाले विश्वविद्यालय जैसे जेएनयू डीयू., ये सभी के सभी संस्थान बैरिकेटिंग एजेंसी के अंग्रेजीयत के सामाजिक वर्चस्व का साँस्कृतिक बोध को पैदा करने का काम करती है। अंग्रेजीदां बनने की चाह ने इस देश को अपने मोहपाश में इस कदर जकड़ा रखा है कि समाज का हर तबका अपना सब कुछ दांव पर लगा कर अपनी भाषा का शुद्धिकरण की चाह रखता है। भोजपुरी, मैथली, बांगड़ी बोलने वाले बैकवर्ड कहलाएंगे और दो लाईन अंग्रेजी में गिट-पिटाए नहीं कि मॉर्डन हो जाएंगे। अंग्रेजीदां बन हर कोई गिट-पिटाना चाहता है, पर यह अंग्रेजी ही इस देश की 95 प्रतिशत ग्रामीण, कस्बाई, निम्न एवं निम्न मध्यमवर्गीय मेहनतकश तबके को व्यवस्था से दूर रखने का काम करती है। .. और साथ यह ज्ञान, पूँजी, नौकरशाही, राजनीति के शीर्ष को 3 प्रतिशत ऊपरी तबके तक के लिए सुरक्षित भी रखती है। बस यहीं से भ्रष्टाचार’, ‘शोषण’, ‘गैरबराबरीगड़बड़ झाला शुरू होता है। अंग्रेजीयत ही भ्रष्टाचार’, ‘शोषण’,  ‘गैरबराबरीके साँस्कृतिकरण करने का काम करती है। अंग्रेजी को सिर्फ़ भाषा समझना उसकी ताकत को कम कर आंकना है। अंग्रेजी सिर्फ़ भाषा नहीं, भारतीय समाज में अंग्रेजों के जमाने में तैयार नव-ब्राहमण अंग्रेजीदा एलिट वर्ग के वर्चस्व को बनाए रखने वाली की व्यवस्था भी है।
जन समान्य की बोली-भाषा में ही जन-समान्य की चेतना को जागृत करने वाली शिक्षा संभव है। नकि, देश के बाहर की भाषा अंग्रेजी में । जन-जन के शिक्षित होने पर ही जन चेतना जागृत होगी। जागृत जन से ही जन क्रांति का प्रतिष्फुटन होगा ........ स्पष्ट है जन भाषा में ही जन वाद संभव है । जन वाद से जनतंत्र.........जन भाषा के बीना जन तंत्र लुटतंत्र से अधिक कुछ नहीं....
भारतीय समाज में अंग्रेजी सिर्फ भाषा ही नहीं, शिक्षा के माध्यम से अंग्रेजीदा वर्ग के आरक्षण को बनाए रखने वाला व्यवस्थाजनित सांस्कृतिक हथियारभी है।
आइये! मानसिक रूप से गुलाम बनाने वाले भाषायी मिथ से पर्दा हटाने के लिए इस अभियान का हिस्सा बने ।
जन भाषा जन शिक्षा जन चेतना अभियान
(भाषाई और शिक्षाई व्यवस्थागत विषमता को समाप्त करने का अभियान )
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