शिक्षा को अंग्रेजी माध्यम के बोझ से मुक्त करने एवं परिवेश की भाषाओं में केजी से
पीजी/पीएच़डी तक समान-सार्थक औपचारिक शिक्षा व्यवस्था,
कानून-न्याय व्यवस्था और रोजगार व्यवस्था को लागू कराने की मांग को
लेकर संविधान के अनुच्छेद 348, 343(1) & (2), 351,147 में व्यापक संशोधन
की मांग
दुनियाभर के श्रेष्ठ शिक्षाविदों के साथ शिक्षा पर शोध
करने वाली एनसीईआरटी के अनुसार भी बच्चों के सीखने का सर्वोत्तम माध्यम बच्चे के
परिवेश की भाषा ही है । संविधान का अनुच्छेद 350क भी प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा
में शिक्षा की व्यवस्था की बात करता है । पर इसके बावजूद गली-गली में इंग्लिश
मीडियम स्कूल खुल रहे है । हमारे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी माता पिता को
स्कूली शिक्षा माध्यम को चुनने के फैसले को देने वाले निर्णय में माना कि बच्चे के
सीखने का सर्वोत्म माध्यम मातृभाषा ही है । पर लोग, माननीय सर्वोच्च न्यायालय की इस नेक नसीहत को नजर अंदाज करते हुए अपने
बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में ठूस रहे है । अभिभावक चाहे महल का हो या
स्लम का, हर एक की पहली पसंद इंग्लिश मीडियम स्कूल ही है ।
परिणाम आज गली-गली में इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल रहे है । पर सवाल यह पैदा होता है
कि इस इंग्लिश मीडियम शिक्षा व्यवस्था में बच्चे कुछ सीख भी पाते है ? साथियों ! शिक्षा का अर्थ मनुष्य की चेतना को जागृत कर ज्ञान को व्यवहारिक
बनाना है । वही हमारे बच्चे ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ की वजह से बीना व्यवहारिक अर्थ समझें रटते चले जाते है । वे रट रट कर
केजी से पीजी तक पास कर जाते है । पर मौलिक ज्ञान सृजन नहीं कर पाते । यह अंग्रेजी
माध्यम व्यवस्था का ही परिणाम है कि हमारे विद्यार्थियों की रूचि टैक्टबुक तक ही
सिमट कर रह गयी है । हमारे बच्चों ने ‘रटने’को ही ‘ज्ञान’ समझ लिया है और ‘अंग्रेजी बोलने की योग्यता को (इंग्लिश स्पीकिंग)’ को
ही ‘शिक्षा’ । विद्यार्थी वर्ग आज सिर्फ उतना पढ़ता है जितना की परीक्षा उत्तीर्ण
करने के लिए काफी है । डिग्री ही ज्ञान है इसका परिणाम यह निकला है कि डिग्री
प्राप्त करों- चाहे रटों, नकल करों या खरीद लो। - इंग्लिश मीडियम शिक्षा की बदौलत शिक्षित नहीं
कुशिक्षित हो रहा है- हमारा समाज । हमारे बच्चे स्कूल में रटे ज्ञान का स्कूल के
बाहर के बाहर की दूनियां के साथ तालमेल नहीं बैठा पाते । ये अंग्ररेजी का ही
परिणाम है कि हमारे बच्चे रेव पार्टियों, उदंडता एवं
अशिष्ट प्रवितृ का शिकार होते जा रहे है । हमारे बच्चे मानक भाषा ही सीखे इसके लिए
आज हमारे घरों में हमनें अपनी बोली में बात-चीत करना तक बंद कर दिया है ।
अंग्रेजीदां बनने की चाह ने इस देश को अपने मोहपाश में इस कदर जकड़ा रखा है कि
समाज का हर तबका अपना सब कुछ दांव पर लगा कर अपनी भाषा का शुद्धिकरण की चाह रखता
है। भोजपुरी, मैथली,
बांगड़ी बोलने वाले बैकवर्ड कहलाएंगे और दो लाईन अंग्रेजी में
गिट-पिटाए नहीं कि मॉर्डन हो जाएंगे। अंग्रेजीदां बन हर
कोई गिट-पिटाना चाहता है । पर वह यह नहीं जानता की 100 में से 99.99% इसमें असफल
ही होगे । यह अंग्रेजी ही इस देश के लोगों को शिक्षा, न्याय
और रोजगार से दूर रखने का काम करती है । माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक
फैसले में माना कि देश की आम जनता कोर्ट की इस नास़ीफ भाषा- अंग्रेजी को नहीं समझ
पाती, आज अनेकों मामले अंग्रेजी की वजह से लंबित पड़े है । हजारों
लोग कोर्ट में सिर्फ सिर्फ वकीलों का मुहँ ताकने को मजबूर है । कोर्ट की भाषा की वजह से तमाम
संवैधानिक एवं उच्च पदों की भाषा भी अंग्रेजी हो जाती है । इसका परिणाम यह
निकलता है कि अधिकारी से लेकर चपड़ासी तक के सभी पदों में अंग्रेजी का घुसपैठ
हो जाता है । जैसा पद वैसी अंग्रेजी । ये रोजगार के अवसरों में
अंग्रेजी की अनिवार्यता ही है जिसने हर एक को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए मजबूर
किया है । हमारे देश की संविधान निर्माताओं ने अंग्रेजी को एक अल्प अवधि के लिए ही
लागू किया था । उन्हें अनुमान था कि संविधान लागू होने के 15 वर्ष के अन्दर हिन्दी
देश के सभी राज्यों में स्वीकार कर ली जाएगी और फिर देश में काम काज की भाषा
अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी हो जाएगी । पर तमिलनाडु में हुए विरोध के चलते हिन्दी
कामकाज की अधिकारिक भाषा नहीं बन पायी । तमिलनाडु आज भी तमिल को उच्चन्यायालय
की अधिकारिक भाषा बनवाने के लिए तरस रहा है । अंग्रेजी व्यवस्था की वजह से
भारत में कहने भर को लोकतंत्र रह गया है । पर ‘इंग्लिश
मीडियम सिस्टम’ की वजह से शासन प्रशासन के स्तर पर होने वाली
कार्यवाही जनता के समझ के बाहर है । जनता न तो मूलतः
अंग्रेजी में लिखे कानून को समझ पाती है, न ही उसके
आधार पर चलने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया को और न ही उसके कलिष्ट हिन्दी एवं भारतीय
भाषाओं में हुए अनुवाद को ही । शोध आधारित विशलेषण के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर
पहुँचे है कि भारतीय संविधान की धारा 348 की वजह से ही गली-गली में अंग्रेजी
माध्यम के अधकचरे स्कूल खुल रहे है। बच्चा हो या बड़ा,
हर एक अपने परिवेश की बोली में ही अपने आप को सहजता से अभिव्यक्त कर
पाता है। मातृभाषा परिवेश पर निर्भर करती है न कि मजहब़, वंश,
जाति आदि पर। अंग्रेजी जैसी गैर परिवेश
की भाषा में तो बस हम रटी रटायी बात ही उगल सकते है। मौलिक चिंतन नहीं कर सकते है।
‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ ने
सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को तोता तैयार करने की फैक्ट्री में तब्दील कर दिया है। जिस से निकला तथाकथित शिक्षित वर्ग रटी रटाई बातो को ही उगलता है। जिस
तेजी से अंग्रेजीयत का काला साया हमारे समाज पर पसर रहा है, उसका
आने वाले 10-15 सालों में प्रभाव यह निकलने वाला है कि ‘का’,’की’ जैसे शब्दों के अलावा कोई भी शब्द भारतीय
सांस्कृतिक बोलियों के नहीं रह जाएगे । भारतीय भाषाओं के शब्दकोश अजायब घर में रखे
जाने वाली विलुप्त धरोहर भर बन कर रह जाएगी । रोम और युनान की तो सभ्यताएं ही मिटी
पर यहाँ तो पूरी की पूरी संस्कृति ही विलुप्त होने के कगार पर है । (नोट:-
संस्कृति = संचित ज्ञान )
जन भाषा जन शिक्षा
जन चेतना अभियान
(भाषाई और शिक्षाई
व्यवस्थागत विषमता को समाप्त करने का अभियान )
‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’,
दैट इज ‘अंग्रेजी राज’
पुस्तक में विषय को विस्तार से पढ़े
अश्विनी कुमार ‘सुकरात’ (प्रवर्तक एवं लेखक) :
फेसबुक/व्टसअप/’टेलीफोनिक
संपर्क हेतू:- 9210473599
Comments