अश्विनी कुमार 'सुकरात'
जनभाषा जनशिक्षा जनचेतना अभियान,
नई दिल्ली
23/03/2016
सेवा में,
माननीय संसद C/o राष्ट्रपति,
एवं माननीय राष्ट्रपति महोदय,
माननीय प्रधानमंत्री महोदय एवं कैबिनेट,
एवं लोकसभा अध्यक्ष(लोकसभा के सदन के पटल पर रखने हेतू) एवं लोकसभा याचिका समिति,
एवं राज्यसभा सभापति(राज्यसभा के सदन के पटल पर रखने हेतू), एवं राज्यसभा याचिका समिति,
एवं नेता प्रतिपक्ष(लोक सभा),
एवं नेता सत्ता सत्ता पक्ष (राज्य सभा),
एवं नेता विरोधी पक्ष(राज्य सभा),
एवं माननीय समस्त सांसद,
संसद/राष्ट्रपति भवन/प्रधानमंत्री कार्यालय,
दिल्ली 110001 (भारत)
महोदय,
खुला पत्र / ज्ञापन/ मन की बात
मानसिक गुलामी को बनाए रखने वाले तंत्र के रूप में ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’
राष्ट्रपति,संसद, प्रधानमंत्री से मानसिक गुलामी से आजाद करने की गुहार
विषय:-भारतीय समाज को मानसिक गुलामी से मुक्त करने, शिक्षा को अंग्रेजी माध्यम के बोझ से मुक्त कर परिवेश की भाषाओं में केजी से पीजी/पीएच़डी तक समान-सार्थक औपचारिक शिक्षा व्यवस्था, कानून-न्याय व्यवस्था और रोजगार व्यवस्था को लागू कराने की मांग को लेकर संविधान के अनुच्छेद 348, 343(1)&(2), 351,147 समेत सम्पूर्ण 17वें अध्याय में व्यापक संशोधन की मांग ।
माननीय एवं सम्माननीय महोदय,
सादर नमस्कार,
श्रीमान, कृपया माननीय प्रधानमंत्री महोदय, संसद को लिखे इस पत्र पर गौर करे । जिसमे स्पष्ट किया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 348, 343(1) और (2), 351, 147 के साथ संविधान के 17 अध्याय में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है । इन परिवर्तनों के बिना न तो आरक्षण का फायदा ही समाज के नीचले पायदान पर विराजमान लोगों को मिलेगा और न ही भारत आर्थिक रूप से कभी चीन-जपान का मुकाबला कर पाएगा । न ही शिक्षा के सार्वभौमिकरण का लक्ष्य ही कभी हाशिल हो पाएगा ।
महोदय, अब तक मैं इंग्लिश मीडियम सिस्टम की सच्चाई को उजागर करते सात पत्र आपको भेज चुका हूँ । प्रधानमंत्री कार्यालय ने मेरे दूसरे पत्र को मानव संसाधन मंत्रालय को भेजा, मानव संसाधन मंत्रालय ने आगे एन.सी.इ.आर.टी. को भेजा, आपकी कृपा द्वारा स्थापित इस संस्था ने मेरे द्वारा लिखे पत्र के पक्ष में रिपोर्ट आपके मंत्रालयों को भेजी जिसकी एक कॉपी मुझें भी भेजी गयी पर बडे ही खेद की बात है कि अब तक न तो माननीय प्रधानमंत्री ने, ही न ही उनके मंत्रालय ने इस विषय पर कोई कार्यवाही की और न ही संसद के पटल पर ही इस विषय को चर्चा हेतू ही रखा । आपसे अनुरोध है कि इस बजट सत्र में इस विषय पर चर्चा करवाये संविधान में यथोचिच संशोधन करवाये । पूर्व में भेजे गये समस्त पत्र, इसी विषय पर लिखी गयी शोध आधारित पुस्तक ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम दैट इज अंग्रेजी राज’ का पीडीएफ और निष्कर्ष बिन्दुओं का पीडीएफ साथ में संलग्न है । वह बुकलेट इस पत्र के साथ संलग्न है ।
इसी क्रम मं मैं दूसरा पत्र आपको पुनः पेस्ट कर रहा हूँ ।
अतः अंग्रेजी के आरक्षण अर्थात अंग्रेजी माध्यम की समस्या पर व्यापक पर सभी कोणों से विचार करने की आवश्यकता है ।
अतः आपसे अनुरोध है कि इस विषय पर सदन में संविधान संशोधन लाए, पत्र एवं साथ संलग्न पुस्तक इंग्लिश मीडियम सिस्टम दैट इज अंग्रेजी राज वं उसके निष्कर्ष बिन्दुओं का अनुवाद अपने-अपने क्षेत्र की बोली भाषाओं कर भारत के सभी पत्र पत्रिकाओं में छपवाने का सहयोग करे । ताकि " मानसिक गुलामी को बनाए रखने वाले तंत्र के रूप में ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ " विषय पर देश भर मं व्यापक बहस हो सके ।
हमे चाहिए आजादी !, आजादी भई आजादी !!
मानसिक गुलामी से आजादी!, भाषाई भेदभाव से आजादी!!,
अंग्रेजीदां वर्ग के वर्चस्व से आजादी ! आजादी भई आजादी!!!
अंग्रेजीदां वर्ग के आरक्षण से आजादी
अंधविश्वास एवं अन्धानुयायिता को बढ़ावा देने वाले
‘इंग्लिश मीडियम एजुकेशन’ से आजादी,
शोषण, भ्रष्टाचार और गैरबराबरी को बनाए रखने वाले
‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ से आजादी!
मानसिक गुलामी से आजादी ! आजादी भई आजादी !!
आजादी भई ! आजादी !
आपका साथी एवं सहयोगी
'देशद्रोही' अश्विनी कुमार 'सुकरात'
फेसबुकएवं एवं वाट्सअप संपर्क करने हेतू फोन 9210473599, 9990210469
जन भाषा – जन शिक्षा – जन चेतना – अभियान
(भाषाई, शिक्षाई एवं व्यवस्थागत विषमताओं को समाप्त करने हेतु अभियान)
‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ = काले अंग्रेजों का‘अंग्रेजी राज’ = ‘भ्रष्टाचार’, ‘शोषण’, ‘गैरबराबरी’ की व्यवस्था पर ‘साँस्कृतिक ठप्पा’
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From: ASHWINI KUMAR <english.medium.angregi.raj@ gmail.com>
Date: 2016-03-16 19:03 GMT+05:30
Subject: मानसिक गुलामी को बनाए रखने वाले तंत्र के रूप में ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ राष्ट्रपति,संसद, प्रधानमंत्री से मानसिक गुलामी से आजादी की गुहार विषय:-भारतीय समाज को मानसिक गुलामी से मुक्त करने, शिक्षा को अंग्रेजी माध्यम के बोझ से मुक्त कर परिवेश की भाषाओं में केजी से पीजी/पीएच़डी तक समान-सार्थक औपचारिक शिक्षा व्यवस्था, कानून-न्याय व्यवस्था और रोजगार व्यवस्था को लागू कराने की मांग को
To: usgrievance@rb.nic.in, secy.president@rb.nic.in, mathew.thomas@rb.nic.in, Press Secretary <presssecyrb@gmail.com>, gaitrikumar@rb.nic.in, Suresh Yadav <osdtopresident@rb.nic.in>, pstopresident@rb.nic.in, cabinet@nic.in
From: ASHWINI KUMAR <english.medium.angregi.raj@
Date: 2016-03-16 19:03 GMT+05:30
Subject: मानसिक गुलामी को बनाए रखने वाले तंत्र के रूप में ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ राष्ट्रपति,संसद, प्रधानमंत्री से मानसिक गुलामी से आजादी की गुहार विषय:-भारतीय समाज को मानसिक गुलामी से मुक्त करने, शिक्षा को अंग्रेजी माध्यम के बोझ से मुक्त कर परिवेश की भाषाओं में केजी से पीजी/पीएच़डी तक समान-सार्थक औपचारिक शिक्षा व्यवस्था, कानून-न्याय व्यवस्था और रोजगार व्यवस्था को लागू कराने की मांग को
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अंग्रेजी नहीं अब हिन्दुस्तानी - तमिल तेलगु हो या संथाली भाषी - हर जन भाषी की एक कहानी-
संविधान की धारा 348, 343(1)&(2), 351 में संशोधन की मांग को लेकर सर्वोच्च-न्यायालय, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति एवं सांसदों के नाम लिखा खुला पत्र
अश्विनी कुमार
नई दिल्ली
31/07/2014
सेवा में,
माननीय लोकसभा के समस्त सांसदगण,
C/o लोक सभा अध्यक्ष
लोकसभा,
संसद भवन
दिल्ली 110001
विषय :- मानसिक गुलामी को बनाए रखने वाले तंत्र के रूप में ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ (अंग्रेजी राज)
-व्यवस्था का बोझ बच्चों के सर-
-संविधान की धारा 348, 343(1)&(2), 351 में संशोधन की मांग को लेकर संसद के नाम खुला पत्र
सादर नमस्कार,
मैं तहे दिल आपको लोकसभा में भारतीय भाषाओं के विषय पर चर्चा करने के लिए धन्यवाद देता हूँ। आपके इस प्रयास से भाषा के लिए आन्दोलन करने वाले आन्दोलनकारियों को काफी बल मिला है। आपसे अनुरोध है कि यदि संभव हो तो इस पत्र को देश के सभी सांसदो (वर्तमान एवं पूर्व) , विधायकों, समस्त जनप्रतिनिधियों, प्रबुद्घ जनों, देश की हर चौपाल तक पहुचाने में मेरी मदद करे। ताकि मैं हर एक तक ये बात पहुचायी जा सके कि यदि आप अंग्रेजी व्यवस्था के साथ है तो आप मानसिक गुलामी को बनाए रखने वाले तंत्र का हिस्सा है।
मैं अपनी पुस्तक जिसका शीर्षक है,- ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’, दैट इज़ ‘अंग्रेजी राज’: भ्रष्टाचार, शोषण, गैरबराबरी की व्यवस्था पर ‘साँस्कृतिक ठप्पा’ की एक प्रति आपको भेज रहा हूँ। यह पुस्तक शोध पर आधारित है तथा गाँधीजी के हिन्दुस्तानी की संकल्पना को ही भारत की परिस्थितियों में सही पाती है। साथ ही यह दलित वंचित सर्वहारा समुदाय को बराबरी पर लाने और देश की एकता और अखंडता को बढ़ाने का मार्ग भी दर्शाती है। इस पुस्तक को लिखने के लिए किए गये अध्ययन के दौरान मैंने पाया कि इस देश के सभी भागों अर्थात् उत्तर, दक्षिण पूरब, पश्चिम, हर कोने के ग्रामीण, कस्बाई, स्लम, निम्न एवं निम्न-मध्यम वर्गीय आबादी के समक्ष अंग्रेजी भाषा आधारित सिस्टम एक बाधा के रूप में खड़ा है और इस सिस्टम का बोझ अंततः हमारे अबोध बच्चों के सिर पर ही पड़ता है।
मानसिक गुलामी को बनाए रखने वाले तंत्र के रूप में अंग्रेजी
1. एक भाषा के रूप में अंग्रेजी सीखने में अपने-आप में कोई बुराई नहीं है, पर व्यवस्था के रूप में अंग्रेजी देश के 95% लोगों को मुख्यधारा से काटे रखने का ही काम करती है। व्यवस्था के रूप में अंग्रेजी का यह वर्चस्व ही है जिसने लोगों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की तरफ़ भागने को विवश किया है। लोगों का अंग्रेजी-प्रेम पतंगे और शमां का प्रेम है। शमां के प्रेम में अंधा पतंगा नहीं जानता कि शमां उसे जला देगी। प्रेम में अंधा पतंगा शमां पर लपकता है और जल जाता है। इसी प्रकार लोग भी अंग्रेजी के मोह में अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की तरफ़ भागते हैं और भूल जाते हैं कि अंग्रेजी के वर्चस्व वाली शिक्षा उन्हें कभी आगे बढ़ने नहीं देगी। परिणाम भी अपेक्षित ही निकलता है। देश के ग़रीब वर्ग (90%) के 99.99% लोग बीच रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। जो .01% यदि गलती से कामयाब हो जाते हैं वे शेष 99.9% के आदर्श के रूप में स्थापित हो जाते हैं। इस प्रकार देश की 3% अमीर , एलिट आबादी की सत्ता सुरक्षित रहती है।
2. जी हाँ ! इंग्लिश मीडियम केवल स्कूल ही नहीं होते, इंग्लिश मीडियम अदालतें भी होती हैं। इंग्लिश मीडियम संसद के कानून भी होते हैं, सम्पूर्ण नौकरशाही का ढाँचा इंग्लिश मीडियम ही है। स्कूल तो बेचारे इसलिए इंग्लिश मीडियम खुलते हैं क्योंकि हमारे देश और समान के ये सभी संस्थान इंग्लिश मीडियम हैं। इन सबको पालने-पोसने का काम इंग्लिश मीडियम विश्वविद्यालय, युपीएससी, डीएसएसएसबी, एसएससी आदि करते हैं। यही अल्प तंत्र ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ है। यह ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ ही शोषण और गैर-बराबरी के ‘अल्पतांत्रिक-पंगु-पूँजीवादी’ किले को बनाए रखने वाली ‘अंग्रेजीदां साँस्कृतिक दीवार’ को पुख्ता करने का काम करता है। सत्ता को चंद हाथों तक समेटे रख कर, यह सिस्टम उस किले के चारों तरफ़ भ्रष्टाचार की सड़ांध वाली दलदली जमीन निर्मित करता है।
3. इस ‘इंग्लिश मीडियम तंत्र’ को नेस्तनाबूद किए बिना न तो भ्रष्टाचार की गंदगी दूर की जा सकती है और न ही सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी को बनाए रखने वाले किले की दीवार को ही ढहाया जा सकता है। आम जनता की समझ से परे की भाषा का अल्पतंत्र ही आम जनता को भ्रम और असमंजस की स्थिति में रखता है।
4. संवैधानिक संस्था यूपीएससी, डीएएसएसएसबी, राज्यों की पीसीएस एवं गैर संवैधानिक संस्था यूजीसी, आईआईटी, आईआईएम (UPSC, DSSSB, State’s PCS, UGC, IIT, IIM) आदि ‘बैरिकेटर एजेंसी’ भर हैं, जो इस सिस्टम को बनाए रखने का काम करती हैं। इनके द्वारा आयोजित की जाने वाली परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता इसलिए रखी जाती है कि उस अंग्रेजी के सहारे ग्रामीण कस्बाई गैर-अंगेजीदा-एलिट पृष्ठभूमि के अभ्यार्थियों को सत्ता के गलियारे से दूर रखा जा सके और राजसत्ता के स्वरूप को अंग्रेजीदां वर्ग के अनुरूप बनाए रखा जाए। सरकार ‘ऑपरेटिंग एजेंसी’ के रूप राजसत्ता के स्वरूप की रक्षा करते हुए, उसे चलाने भर का काम करती है। शायद इसी कारण सत्ता में आते ही राजनेताओं के सुर-ताल बदल जाते हैं।
5. वर्तमान में सिविल सेवा चयन हेतु आयोजित की जाने वाली परीक्षा में 2011 से सी-सैट (CSAT) लागू कर प्रारंभिक परीक्षा के स्वरूप में जो परिवर्तन किया गया है वह भी इसी कड़ी का हिस्सा है। ऐसा नहीं है कि यू.पी.एस.सी. के द्वारा 2011 से पहले ली जाने वाली परीक्षा भेद-भाव से मुक्त थी। यदि हम 2011 से पूर्व के ग्राफ को भी देखें तो पाते हैं कि प्रारंभिक परीक्षा में बेशक हिन्दी समेत अन्य भाषा माध्यमों से औसतन 45% प्रतिशत अभ्यार्थीं पास होते होते थे, पर साक्षात्कार के बाद का आँकड़ा 10-12 % तक का ही रह जाता था। समस्त भारतीय भाषा माध्यमों से भारतीय सिविल सेवा में चयनित होने वाले उम्मीदवारों की संख्या शायद ही कभी 30% के आकड़े को पार कर पायी हो। अतः इस परीक्षा के पुराने पैटर्न में भी अंग्रेजीदां वर्ग का ही दबदबा बना हुआ था। यूपीएससी (UPSC) की शेष परीक्षाओं में से अधिकतर अंग्रेजी में ही संपन्न होती हैं। चाहे वह भारतीय आर्थिक सेवा परीक्षा हो या भारतीय वन सेवा परीक्षा, सभी परीक्षाओं में अंग्रेजीदां वर्ग का दबदबा बना हुआ है। (स्रोत्र - यूपीएससी (UPSC) रिपोर्ट)
6. NDAऔर CDS की परीक्षा में बेशक ग्रामीण पृष्ठभूमि के उम्मिदवारों की संख्या अधिक हो, पर अंततः चयनित होने वाले अभ्यार्थी, शहरी उच्च मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि के ही होते हैं। उसमें से भी अधिकतर वे उम्मीदवार होते हैं, जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि आर्मी के अफसर की होती है। आर्मी में तो भारत और इंडिया का विभाजन साफ दिखता है। जहाँ निचले क्रम के सैनिक देहाती परिवेश के होते हैं, वही लगभग सभी अफसर अंग्रेजीदां पृष्ठभूमि के ही होते हैं। अफसरों की ‘एंट्री’ कहाँ से होती है?? इन सब उदाहरणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि UPSC,SSB अंततः इंग्लिश के वर्चस्व वाले सिस्टम को ही बनाए रखने का काम करती है।
7. ऊपर दिए गए उदाहरणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि यूपीएससी (UPSC) अंततः इंग्लिश के वर्चस्व वाले सिस्टम को ही बनाए रखने का काम करती है। इसी प्रकार जब हम आईआईटी, आईआईएम, एआईआईएमएस (IIT, IIM, AIIMS) जैसी संस्थाओं की बात करें तो पहला सवाल यही उठता है कि इन संस्थाओं में अंग्रेजीदां शहरी पृष्ठभूमि के लोग ही क्यों चयनित हो पाते हैं? क्या ग्रामीण या भारतीय भाषाई पृष्ठभूमि के लोगों में कोई भी तकनीकी या वैज्ञानिक योग्यता नहीं होती?? सच्चाई तो यह है कि अनुभवजन्य तकनीकी एवं जैविक ज्ञान में ग्रामीण एवं वनवासी लोग ज्यादा दक्ष होते हैं। पर, जब अकादमिक की बात आती है तो किताबी तोते ही बाजी मार जाते हैं।
8. यदि इन संस्थाओं में गलती से भी ग्रामीण या भारतीय भाषाई पृष्ठभूमि का विद्यार्थी पहुँच भी जाए तो उसके पास ‘बैक-बैंचर’ (जो महज खानपूर्ति करने भर के लिए क्लास में बैठते हैं) बनने के अलावा कुछ भी शेष नहीं रहता। अंग्रेजीदां शिक्षक उन्हें ऐसे देखते हैं मानों वे जंगली और असभ्य हों। दिल्ली स्थित एम्स (AIIMS) के विद्यार्थी अनिल मीणा तथा तमिलनाडु स्थित अन्ना विश्वविद्यालय की इंजिनरिंग छात्रा एस. धार्या लक्ष्मी का उदाहरण इसका ज्वलंत उदाहरण है। ये मामले स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार अंग्रेजीदां व्यवस्था ने ग्रामीण प्रतिभाशाली छात्रों को आत्महत्या करने हेतु विवश किया था। पर यह अकेला मामला नहीं है। अंग्रेजी माध्यम वाली व्यवस्था की वजह से जितनी आत्महत्याएँ उत्तर भारत में हुईं, उससे कम दक्षिण में नहीं हुईं। हमने जब इंटरनेट खंगालने का प्रयास किया तो अंग्रेजी वर्चस्व की वजह से आत्महत्या के मामले सबसे ज्यादा तमिलनाडु से ही मिले। वह राज्य जिनके तथाकथित राज नेताओं को अंग्रेजी का प्रवक्ता माना जाता है।(नोट- कुछ लिंक पत्र के अंत मे दिए हैं)
9. अंग्रेजी के वर्चस्व वाली व्यवस्था में न तो मौलिक ज्ञान संभव है न ही रचनात्मक चिंतन।(‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’, दैट इज़ ‘अंग्रेजी राज’ में स्पष्ट) अतः अंग्रेजीदां वर्ग के वर्चस्व के खिलाफ़ भारतीय जन-भाषाओं के अधिकार की लड़ाई अखिल भारतीय स्तर पर लड़े जाने की ज़रूरत है। इसमें तमिल, तेलगू , गुजराती, बंगला, संथाली आदि सभी भारतीय भाषा-भाषियों को ‘एक मंच’ / ‘एक प्लेटफार्म’ पर लाने की भी ज़रूरत है।
10. यूरोपीय यूनियन में जब 24 भाषाओं में काम चल सकता है तो भारत के सरकारी कार्यालयों, बैंकों, निगमों आदि को भारत की 22 भाषाओं में काम करने में क्या समस्या आएगी? यूरोप का छोटे-से-छोटा देश भी अपनी भाषा में शासन एवं शिक्षा तंत्र को चला सकता है तो भारत क्यों नहीं। उदाहरण के तौर पर, बैलज़ियम जैसा छोटे से देश की शासन और शिक्षा व्यवस्था अपनी दो भाषाओं में आसानी से चलती है तो भारत का शासनतंत्र और शिक्षा व्यवस्था भारत की समस्त भाषाओं में क्यो नहीं चल सकती? पूर्व सोवियत संघ में 52 भाषाओं को राजभाषा का दर्जा प्राप्त था। उन सभी भाषाओं में कामकाज भी होता था। आज सोवियत संघ से अलग हुआ प्रत्येक देश अपनी भाषा में ही काम-काज और शिक्षा व्यवस्था का संचालन करता है। तो भारत में राजभाषा का दर्जा सभी 22 भाषाओं को क्यों नहीं दिया जा सकता?
11. सच्चाई तो यह है कि स्वतंत्रता के बाद से ही, भारतीय भाषा-भाषी लोगों को ही आपस मे लड़ाया जा रहा है। कहने के लिए अनुच्छेद 351 में संघ के द्वारा हिन्दी के प्रसार की बात कही है। पर हकीकत में उसकी आड में प्रचलन से बाहर की हिन्दी का उपयोग किया जा रहा है। पिछवाड़े के चोर दरवाजे से संविधान के अनुच्छेद 348, 343(2) और 348 का अनुच्छेद 120, 210 पर जो प्रभाव है, वह अंततः अंग्रेजी का ही वर्चस्व स्थापित करता है। कहने को संविधान का अनुच्छेद 350 (ख) भाषाई अल्पसंख्यकों की रक्षा की बात करता है पर यहाँ तो अंग्रेजीदां-एलिट वर्ग की भाषा भारत की सभी भाषाओं को लील रही है। संविधान का अनुच्छेद 350(A) राज्य को निर्देश देता है कि राज्य प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था करे। पर जैसा कि ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’, दैट इज़ ‘अंग्रेजी राज’ की केस स्टडी स्पष्ट करती है कि लोग उस माध्यम में बच्चों को पढ़ाना चाहते है, जो राजकाज और उच्चशिक्षा की भाषा होती है। माननीय सुप्रीमकोर्ट ने भी पिछले दिनों English Medium Students Parents ... vs State Of Karnataka on 8 December, 1993, 1994 AIR1702, 1994 SCC (1) 550 इस बात को और पुख़्ता करता है। संविधान संसद और विधानसभाओं में हमारे जनप्रतिनिधियों को अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में बोलने एवं विचार रखने की छुट देता है। पर संविधान का अनुच्छेद 348 ही वास्तव में संसद और विधानसभाओं के काम काज की भाषा को निर्धारित करती है। अनुच्छेद 348 (न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी रखे जाने संबंधी) ही हमारी अंग्रेजीदां व्यवस्था की वास्तविक सच्चाई है। इसी के आधार पर किसी भी विवाद की स्थिति में अंग्रेजी में लिखी गयी बात ही अंतिम सत्य होती है। अनुच्छेद 348 के आधार पर ही तमाम परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों पर लिखा होता है कि किसी भी विवाद की स्थिति में अंग्रेजी में लिखी गयी बात ही सत्य होगी। परिणाम यह निकलता है कि मूल काम अंग्रेजी मे होगा, फि़र उसका अनुवाद भारतीय भाषाओं में होगा। संसद और विधानसभाओं द्वारा कानून भी मूल रूप से अंग्रेजी में में पास होता है। भारतीय भाषाओं में तो अनुवाद भर होता है। यदि भारतीय संसद या विधान सभा मूल कानून को भारतीय भाषाओं में पास करे तो भी उसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए अंग्रेजी वर्जन तैयार करेगा। संविधान के अनुच्छेद 348 की वजह से, माननीय सर्वोच्च न्यायालय की नज़र में, वह अंग्रेजी वर्जन ही अंतिम सत्य है। इस प्रकार भारत की भाषाओं की उपयोगिता इस व्यवस्था में सजावट के फूलों भर की रह जाती है, जिनके काँटों का प्रयोग एक दूसरे को तोड़ने के लिए किया जाता है।
12. हिन्दी को राज भाषा बनाने वाली संविधान की धारा 343 एक तरफ़ तो हिन्दी बैल्ट माने जाने वाले क्षेत्र के लोगों में तत्सम प्रधान तथाकथित हिन्दी के राष्ट्र भाषा होने का भ्रम पैदा करती है और दूसरी तरफ़ गैर-हिन्दी-भाषी माने जाने वाले क्षेत्रों में हिन्दी-भाषी लोगों के वर्चस्व का भय जगाती है। फलस्वरूप ‘तथाकथित हिन्दी-भाषी’ और ‘तथाकथित गैर हिन्दी-भाषी’ एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं। इस प्रकार 343 की आड़ में ही अनुच्छेद 348, और 147 ही नहीं 343 से लेकर 351 के सभी अनुच्छेद अंततः इंग्लिश के वर्चस्व को ही कायम रखते हैं। हम भारत के लोगों के सामने अनुच्छेद 350, 350A, 350B और 351 के माध्यम से भारतीय भाषाओं के संरक्षण की वकालत की गयी है, संविधान की ये धाराएं संविधान के सजावटी दांत भर हैं। अनुच्छेद 351 ने तो अनुवाद की हिन्दी को ही पैदा किया है। हकीकत में अनुच्छेद 348 343(2), 344 अंग्रेजी के वर्चस्व को ही बनाये रखते है। अंग्रेजी का वर्चस्व विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित कर, अवसर को अंग्रेजी-भाषी तबके तक सीमित रख, भारत के लोगों को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक न्याय से वंचित रखता है।
13. अतः देश के भारतीय भाषा भाषी लोगों की आपसी बंधुता को खत्म करने का काम अनुच्छेद 343 ही करता है।
14. लेटिन अमेरिका, यूरोप-युरेशिया, को जब अंग्रेजी का मोह नहीं है, तो भारत को इस तथाकथित अंतरराष्ट्रीय भाषा (अंग्रेजी) का का मोह इतना क्यों बाँधे हुए है? आज हमारे देश में अंग्रेजीदां वर्ग द्वारा यह भ्रम भी एक षडयंत्र के तहत फैलाया जाता है कि अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है, इस कारण इंग्लिश मीडियम जरूरी है। यह मात्र एक भ्रामक तथ्य है। अंग्रेजी तो केवल उन्हीं मुल्कों के लिए तथाकथित रूप से अंतरराष्ट्रीय भाषा बना कर रखी गई है, जो कभी अंग्रेजों के गुलाम थे, हमारा देश भी इनमें शामिल है और इन गुलाम देशों के अलावा, और किसी-भी देश में अंग्रेजी को एकमात्र अंतरराष्ट्रीय भाषा नहीं माना जाता। बाकी देश जैसे- चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, रूस आदि देशों में यह भ्रम नहीं है, वे संयुक्त राष्ट्र संघ की पांचों भाषाओं को अंतरराष्ट्रीय भाषा मानते हैं, केवल अंग्रेजी को नहीं। और इसी आधार पर इन सभी सार्वभौम देशों में उनकी शिक्षा-व्यवस्था और राजतंत्र उनकी अपनी भाषाओं में चलता है। आज समय आ गया है कि हम इस मानसिक गुलामी संबंधी तथ्य को समझ लें।
15. लोकतंत्र में शासन में जनता की सहभागिता तभी आ सकती है जब शासन व्यवस्था जन-भाषाओं में हो। यूरोप में लोकतंत्र के विकास के साथ वहाँ की जनभाषाएं शासन प्रशासन और शिक्षा का हिस्सा बनीं। भारत में कहने के लिए लोकतंत्र है। पर ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ की वजह से शासन प्रशासन के स्तर पर क्या घाल-मेल होता है यह जनता के समझ के बाहर है। जनता न तो मूलतः अंग्रेजी में लिखे कानून को समझ पाती है और न ही उसके आधार पर चलने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया को और न ही उसके कलिष्ट हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में अनुवाद को ही।
16. राज-व्यवस्था और जन-सधारण में अन्तर को बनाये रखने के लिए ही ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ को हमने आज तक संभाल कर रखा हुआ है। यह सिस्टम ही सत्ता को चंद हाथों तक समेटे रख भ्रष्टाचार की संस्कृति को पैदा करता है। 90% आबादी को सत्ता और अधिकारों से दूर रख गैर-बराबरी को कायम रखता है, शोषण को स्थायित्व प्रदान करता है। यह इंग्लिश प्रधान व्यवस्था ही है जो इस देश को भारत और इंडिया में विभाजित करता है। 1947 के सत्ता हस्तांतरण के बाद जो आजादी मिली वह इंडिया के हिस्से में आयी। भारत तो आज भी इंडिया का उपनिवेश है। इंडिया ही उस वक्त शिक्षा शासन-प्रशासन और सत्ता के तमाम केन्द्रों पर काबिज़ था। उसकी सुविधा की भाषा ही अंग्रेजी थी। यहाँ तक कि मूल संविधान भी अंग्रेजी में ही बना था। भारतीय भाषा में तो उसका अनुवाद ही हुआ था। अंग्रेजीदां वर्ग की सुविधा के लिए ही 15 वर्ष तक अंग्रेजी को बनाए रखने का सांवैधानिक मार्ग रचा गया। ये 15 वर्षों की अवधि हमेशा आगे ही बढ़ाई जाती रही और आज भी सब जगह अंग्रेजी का ही राज चल रहा है।
17. सच्चाई तो यह है कि 1947 के बाद भारतीय भाषाओं के प्रसार के लिए कोई ईमानदार और गंभीर प्रयास ही नहीं किया ही नहीं गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यूपीएससी (UPSC) द्वारा आयोजित की जाने वाली समस्त परीक्षा अंग्रेजी में ही ली जाती रही है। भारतीय सिविल सेवा (आई.सी.एस.) की परीक्षा के लिए भी भारतीय भाषाओं के दरवाजे 1979 में ही खोले गये। वह भी अंग्रेजी की अनिवार्यता और वर्चस्व के साथ। युपीएससी के द्वारा ली जाने वाली तमाम दूसरी परीक्षाएं अब भी अंग्रेजी में ही ली जा रही है। माननीय सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय के जज तो अनिवार्य रूप से अंग्रेजीदां वर्ग से ही होगे। 1947 से पूर्व हम राजनैतिक रूप से गुलाम थे पर मानसिक रूप से आजाद थे। आज स्थिति उसके ठीक उलट है। अंग्रेजीदां वर्ग ने हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाया है। आज भारत(90%लोग) अंग्रेजीदां-एलिट-इंडिया(3%) के गुलाम है।शेष 7% गुलामी के तंत्र को बनाए रखने में इस्तेमाल किए जाते हैं।
18. प्रो. प्रोमेश आचार्य का अध्ययन भी यह कहता है भारतीयों का अंग्रेजी के प्रति मोह आजादी के बाद के वर्षों में बढ़ा है। आज देश का अधिकांश युवा अपने आप को ‘विटामिन-ई’(इंगिलिश) की कमी ‘डेफिशियेंसी’ की वजह से कमजोर मानने लगा है। युवाओं में कमजोरी का यह भ्रम एक षड़यंत्र के जरिए स्थापित किया जाता रहा है, जो कि ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ की ही देन है। किसी भी परीक्षा या शिक्षण संस्थान में अंग्रेजी की अनिवार्यता ग्रामिण, वनवासी, कस्बई, गैर-अंग्रेजीदां शहरी लोगों को 20% से 100% तक पीछे धकेलती है। साथ ही मानसिक रूप से हीन भावना से ग्रसित करती है।( प्रयोग के आधार पर प्रमाणित बात।)
19. अतः भारत को मानसिक गुलामी की गैर-बराबरी, शोषण और भ्रष्टाचार को बनाए रखने वाली व्यवस्था से मुक्ति के लिए भारत की भाषाओं को एक मंच, एक प्लेटफार्म पर आने की ज़रूरत है। अंग्रेजीदां वर्ग ने संविधान के कुछ अनुच्छेदों की आड़ में भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ा कर अंग्रेजी के माध्यम से राज-काज को अंग्रेजीदां वर्ग तक ही समेटे रखने की चाल चली है। अभी तक एक तरफ़ हिन्दी को राजभाषा बनाने और उसका प्रसार करने की मात्र खानापूर्ति की जाती रही है, दूसरी तरफ़ हिंदी सहित अन्य सभी भारतीय भाषा-भाषी वर्गों को अंग्रेजी के मुकाबले दोयम दर्जे पर ला कर खड़ा कर दिया गया है।
20. कार्टूनिस्ट आर. के. लक्ष्मण के कार्टून(साथ संलगन) भी इस बात को स्पष्ट करते हैं कि अंग्रेजीदां वर्ग ने ही हिन्दुस्तानी भाषियों को आपस में लड़वाया। अंग्रेजी के माध्यम से अंग्रेजी परस्त एलिट तबके ने सत्ता (नौकरशाही, न्याय, ज्ञान, पूँजी) को अपने तक ही सीमित रखा। इसी का परिणाम है कि विश्व ज्ञान क्रम में भारत पिछड़ता रहा है।(देखें पुस्तक) आज हमारे देश के सभी स्कूल तोते तैयार करने की फैक्ट्रियों में तब्दील हो चुके हैं। मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग का कोई भी अभिभावक खुशी से अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाखिल नहीं करवाता है। यह तो सिस्टम के साथ ‘एडजस्ट’ होकर चलने की मजबूरी है, जो उसे ऐसा करने को बाध्य करती है।
21. इस संबंध में, माननीय सुप्रीमकोर्ट ने पिछले दिनों अंग्रेजी माध्यम छात्र अभिभावक बनाम कर्नाटक राज्य (English Medium Students Parents vs State Of Karnataka on 8 December, 1993, 1994 AIR1702, 1994 SCC (1) 550) वाद पर दिया गया निर्णय भी विचारणीय है।( इस फैसले के खिलाफ माननीय सर्वोच्च न्यायालय में PIL ‘व्यवस्था बोझ बच्चों के सर’ साथ संलग्न है। उसकी एक कॉपी पहले भी भेज चुका हूँ।) अभिभावक भी जानता है कि उसका बच्चा उसी बोली में सहज है जो उसके परिवेश में बोली जाती है, पर उसके बावजूद वह सिस्टम के दबाव में इंग्लिश मीडियम स्कूल में भेड-बकरियों की तरह अपने बच्चे को ठूँसता जाता है। यह इंग्लिश मीडियम सिस्टम का दबाव है, जिसकी वज़ह से अभिभावक इंग्लिश मीडियम स्कूलों को चुन रहा है। अभिभावकों द्वारा मजबूरी में लिए गये निर्णय को उनका मौलिक अधिकार नहीं कहा जा सकता है। जब तक यू.पी.एस.सी. और इस जैसी तमाम संस्थाएँ अंग्रेजी भाषा/माध्यम विभिन्न पदों पर चयन का पैरामीटर/मानदंड बनाती रहेंगी, तब तक संविधान की धारा 350A एक प्रभावहीन अपैंडिक्स मात्र ही बना रहेगा।
22. इंग्लिश मीडियम सिस्टम का प्रभाव ही है कि इंग्लिश बोल पाने की योग्यता को ही लोगों ने भ्रमवश ज्ञान और व्यक्तित्व–निर्माण समझ लिया है। बच्चे ही नहीं व्यस्कों की मौलिक समझ भी अपनी मातृभाषा (परिवेश की भाषा-बोली) में ही प्रस्फुटित होती है। पर यह सिस्टम का ही दबाव है कि लोग अंग्रेजी में रटी-रटाई बात को उगलने को ही ज्ञान समझ बैठते हैं। अतः इंग्लिश मीडियम सिस्टम को बनाए ऱखने में संविधान की धारा 348, 343(1) &(2), 147 और धारा 348 का धारा 210 और 120 पर प्रभाव की अहम भूमिका है। अंग्रेजी माध्यम व्यवस्था रूपी रावण की नाभि अनुच्छेद 348 और 147 छुपी है। अतः इन धाराओं को तत्काल प्रभाव से बदलने की ज़रूरत है। यू.पी.एस.सी., डी.एस.एस.एस.बी., एम्स, आई.आई.टी. विश्वविद्यालय, जैसी संस्थाएँ तो आम जनता के विरुद्ध ‘बैरिकेटिंग एजेंसी’ का काम कर रही हैं। इनका स्वरूप भी तब बदलेगा जब सत्ता का स्वरूप बदलेगा।
23. बच्चे की मातृभाषा बच्चे के परिवेश पर निर्भर करती है न कि उसके मजहब़, माता-पिता-वंश आदि पर। बच्चा ही नहीं, बड़ा व्यक्ति भी अपने परिवेश की बोली को बड़ी सहजता के साथ अपना लेता है (देखे- ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ दैट इज ‘अंग्रेजी राज’ के अध्याय 15-भाषा एवं संस्कृति को समझने हेतु किये कुछ विशेष अध्ययन, एवं 16- हिन्दुस्तानी – औरंगाबाद शहर में हिन्दुस्तान की मिली जुली संस्कृति का अध्ययन)। संविधान के अनुच्छेद 350A के तहत बच्चे की मातृबोली (मातृभाषा कहना गलत है) पता लगाने के लिए बच्चे के परिवेश का अवलोकन करने की ज़रूरत है। पुस्तक के अध्याय-17 ‘मातृभाषा का अर्थ माँ-बाप की भाषा नहीं होती’ में स्पष्ट किया है कि मातृ-परिवेश की बोली ही मातृ-बोली होती है। मातृ-बोली पूर्ण संरचित नहीं होती परन्तु मिश्रित प्रकृति की मिली जुली भाषा होती है। यह प्रक्रिया स्थाई रूप से चलती रहती है। अतः इसे किसी भाषा विशेष में विभाजित करके नहीं देखा जा सकता।
24. औपचारिक शिक्षा के संस्थान के रूप में स्कूल, विश्वविद्यालय, यू.पी.एस.सी. आदि राजसत्ता की उप-व्यवस्था ही है और ये राजसत्ता की ज़रूरत के अनुरूप सामाजिक स्तरीकरण का काम करते हैं। स्कूल इसलिए इंग्लिश मीडियम हैं क्योंकि राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है।
25. जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है, तब तक साँस्कृतिक भाषाओं में समान स्कूली व्यवस्था की बात सोचना तक बेवकूफी है। जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है,बच्चों की साँस्कृतिक परिवेश में बाल केन्द्रित रचनात्मक एवं विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र की बात हम भारत के लोगों के साथ बेईमानी और धोखा है। जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है, मातृभाषा (संविधान का अनुच्छेद 350A) में शिक्षा का सार्वभौमिकरण (संविधान का अनुच्छेद 21A) महज़ एक युटोपिया है। अतः जब तक ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ रहेगा तब तक हमारे बच्चों को गधे और तोते बनाने वाले ‘इंग्लिश मीडियम स्कूल’ भी बने रहेंगे।
26. अतः विकास में जब तक जन-जन की भागीदारी नहीं होगी, तब तक भारत में न तो जनतंत्र का कोई अर्थ है और न हीं भारत सरकार के विकास के आकड़ों का ही। अतः सहभागी विकास के लिए हिन्दी की हिन्दुस्तानी भाषा-शैली वाले सिस्टम की ज़रूरत है। जब तक सभी भारतीय भाषाओं को एक प्लेटफार्म पर नहीं लाया जाता, तब तक भारत का समग्र विकास संभव ही नहीं है। आम भारतीयों के अच्छे दिन तो तब ही आएँगे, जब शासन-तंत्र इंग्लिश मीडियम को छोड़ कर जन-भाषाओं को अपनाएगा।
27. जब देश के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा तथा शासन का सारा काम-काज जन-भाषाओं में होगा, तभी इस देश के बच्चों को लोग मातृबोली व्यवस्था के स्कूलों में पढ़ाना चाहेंगे। जब शिक्षण कार्य, रचनात्मक एवं बालकेन्द्रित शिक्षाशास्त्र के अनुरूप होगा, तभी मौलिक ज्ञान का सृजन होगा और मानसिक गुलामी से हमारी मुक्ति संभव हो पाएगी।
इस सब बातों को ध्यान में रखते हुए सरकार से हम अपेक्षा रखते हैं कि वह निम्न कदम उठाए –
I. तत्काल प्रभाव से संविधान की धारा 348 में संसद के इसी सत्र में संशोधन किया जाए। अंग्रेजी को हटा कर उसकी जगह भारत की आठवीं अनुसूची की सभी भारतीय भाषाओं को सम्मिलित किया जाए।
II. आठवीं अनुसूची में संशोधन कर उसमे भारत की सभी बोलियों को स्थान दिया है । लिपी भाषा को लिख कर व्यक्त करने का साधन तो है, पर खुद में भाषा नही है । चूकिं आम बोलचाल में हिन्दी और उर्दू में किसी भी प्रकार का व्याकरणीय स्तर पर भेद नहीं है । हिन्दी और उर्दू को औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने अपनी सुविधा एवं फुट डालों राज करों की नीति के तहत दो भाषाओं में विभक्त किया था । अतः सिर्फ लिपी के भेद के आधार पर हिन्दी – उर्दू को दो अलग अलग भाषाएं न माना जाए ।
III. संविधान के अनुच्छेद 343 में संशोधन कर समस्त भारतीय भाषाओं को भारत की राजभाषा बनाया जाए। संविधान में ‘सरकारी-मानक-हिन्दी’ भाषा के स्थान पर मिली-जुली ‘हिन्दुस्तानी’ का अपनाया जाए। जिसे देवनागरी के अतिरिक्त भारत की भाषाओं को लिखने के लिए प्रयोग की जाने वाली सभी लिपियों में लिखा जाए। इसी प्रकार भारत की अन्य भाषाओं को भी एक से अधिक लिपियों में लिखा जाए।
IV. भारत में कानून मूल रूप से भारतीय भाषाओं में बनाए जाएँ। इसके लिए ऐसे सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की सेवाएँ प्राप्त की जा सकती हैं, जिन्हें भारतीय भाषाओं का भी स्तरीय ज्ञान हो। अंग्रेजी में मूलतः बना कर भारतीय भाषाओं में अनुवाद की परम्परा बंद की जाए।
V. भारत का प्रधानमंत्री कार्यालय, समस्त मंत्रालय, सुप्रीम कोर्ट व अन्य सरकारी कार्यालय की अधिकारिक भाषा, सिर्फ़ अंग्रेजी या ‘अनुवाद की मानक हिन्दी’ न हो। बल्कि ये सभी संस्थान भारत की आठवीं अनुसूची की सभी भारतीय भाषाओं में तत्काल प्रभाव से में कार्य प्रारंभ करें। गांधी जी द्वारा प्रतिपादित हिन्दी को बढ़ावा दिया जाए।
VI. सिर्फ़ भारतीय सिविल सेवा परीक्षा ही नहीं, यू.पी.एस.सी., डी.एस.एस.एस.बी, राज्य पी.सी.एस., बैंकिंग सेवा जैसी संस्थाओं की सभी परीक्षाओं के मूल प्रश्न पत्र भारतीय भाषाओं में ही बनाए जाए। अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त हो।
VII. एम्स, आई.आई.टी. आई.आई.एम, दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स आदि जैसी संस्थाओं का ढ़ाँचा भारतीय भाषाओं के अनुरूप बनाया जाए। शिक्षकों के लिए अनिवार्य हो कि वे भारतीय भाषाओं में ही शिक्षण करें। जिस इलाके में शिक्षण संस्थान स्थित हो, उस इलाके की भाषा को ही विश्वविद्यालय या संस्थान की शैक्षणिक भाषा बनाया जाए। जब उच्च शिक्षा भारतीय भाषाओं में होगी तब संविधान का अनुच्छेद 350A स्वतः लागू होगा।
VIII. शैक्षिक साहित्य का भारतीय भाषाओं में अनुवाद को बढ़ावा दिया जाए। भारतीय भाषाओं को एक से ज्यादा लिपियों में लिखने की परम्परा को बढ़ावा दिया जाए। इससे भारतीय भाषाओं में संवाद को बढ़ावा मिलेगा।
IX. विभिन्न विषयों की भारतीय भाषाओं में सभी स्तरों की पाठ्यपुस्तकें तैयार करने का कार्य सभी शिक्षा संस्थानों को सौंपा जाए, जो एक निर्धारित समयावधि में स्तरीय पाठ्य सामग्री/पुस्तकें आदि भारतीय भाषाओं में तैयार करें।
X. तकनीकी एवं शैक्षणिक शब्दों का अटपटा व निम्नस्तरीय अनुवाद बन्द हो। कृपया स्टील प्लांट को इस्पात का पौधा न बनाएँ। यू.पी.एस.सी. के प्रश्न पत्र में आया यह शब्द अव्यवहारिक हिन्दी की देन है। जहाँ तक संभव हो, प्रश्नपत्र और पाठ्य सामग्रियाँ मूल रूप में भारतीय भाषाओं में ही तैयार करवाई जाएँ। जहाँ अनुवाद आवश्यक हो, वहाँ उस विषय के ज्ञाता अनुवादकों से ही अनुवाद-कार्य करवाया जाए, ताकि इस प्रकार के अटपटे अनुवाद न हों। अंग्रेजी से भारतीय भाषाओं के अनुवाद की दरें सम्मानजनक रखी जाएँ ताकि स्तरीय अनुवादक उपलब्ध हो सकें। अनुवाद के लिए प्रशिक्षण को बढ़ावा दिया जाए।
XI. अंग्रेजी ज्ञान का परीक्षण लेना बन्द किया जाए। भारतीय भाषाओं के आपसी संवाद को बढ़ावा दिया जाए। संविधान की धारा 351 में यथावश्यक रूप से संशोधन कर ‘हिन्दी’ के स्वरूप को इस प्रकार निर्धारित किया जाए ताकि उससे ‘हिन्दुस्तानी-शैली’ में अभिव्यक्ति हो सके। कृत्रिम रूप से भाषा को गढ़ना बंद किया जाए, बल्कि लोगों की भाषा को अपनाना शुरू किया जाए। जैसे ‘कम्पयूटर’ शब्द के लिए ‘संगणक’ शब्द कृत्रिम है। हमारे गाँव के लोग ‘कमपूटर’ बोलते हैं तो यह अपभ्रंश प्राकृतिक माना जाना चाहिए।
XII. केन्द्र सरकार अव्यावहारिक हिन्दी (कृत्रिम अनुवाद की हिन्दी) का प्रसार करना बन्द करे। केन्द्र सरकार भारत की सभी भाषाओं को समान बढ़ावा दे। संविधान की धारा 351 में भी यथोचित परिवर्तन कर हिन्दी के स्थान पर समस्त भारतीय भाषाओं को समान स्थान दिया जाए। सरकार भाषा का प्रसार करने के स्थान पर अपनाना शुरू। सरकार बेवजह के अप्रचलित शब्दों का प्रसार करना बन्द करे।
आइए! हम सब मिल कर आम-जन के अधिकारों के लिए कार्य करें और अपनी भावी पीढ़ी को मानसिक और भाषाई गुलामी से मुक्त करने का मार्ग प्रशस्त करें।
………………………….
आपसे अनुरोध है कि आप संसद/कोर्ट/ दफ्तर/ संस्थान/सं गठन/कमेटी/मीडिया आदि में मुझे अपने इस अनुसंधान कार्य एवं अध्ययन को प्रस्तुत करने का मौका दें, ताकि इस विषय पर और अधिक गंभीरता से विचार-विमर्श हो सके।
आपका
अश्विनी कुमार 'सुकरात'
Ph. : 9210473599, 9990210469
C/o श्री. हुकुम सिंह, मकान न. 472 , पार्ट - I , ए- ब्लाक , गली न. - 10, पहला पुस्ता,
(आर. डी. (इंग्लिश मीडियम) स्कूल के समीप), नई दिल्ली दिल्ली110090
इस पत्र की प्रति निम्नलिखित को भी सूचना, विचार एवं यथावश्यक कार्रवाई हेतु भेजी गई :-
1) भारत के माननीय राष्टप्रति महोदय
2) भारत के माननीय प्रधानमंत्री महोदय एवं उनके मंत्रिमंडल के माननीय सदस्यगण
3) संसदीय सचिव महोदय
4) सभी माननीय संसद सदस्य एवं राजसभा के सभापति एवं लोक के अध्यक्ष
5) सभी राज्यों के मुख्यमंत्री महोदय एवं विधान सभा
6) भारत का सर्वोच्च न्यायालय / Supreme Court of India as P.I.L. पी आई एल (PIL) : Against “English Medium Students Parents.. vs State Of Karnataka on 8 Dec., 1993 Equivalent citations: 1994 AIR 1702, 1994 SCC (1) 550” Judgment Bench: Mohan, S. (J) 27-5-2014 व्यवस्था का बोझ बच्चों के सर शीर्षक से
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