व्यवस्था का बोझ बच्चों
के सर
(द्वितीय संस्करण की प्रस्तावना)
भगत सिंह ने कहा था, “मुझे विश्वास है कि आने वाले
15-20 सालों में ये गोरे मेरे देश को छोड़ कर जाएंगे। पर मुझे डर है कि आज जिन
पदों पर ये ‘गोरे अंग्रेज’ विराजमान
हैं, उस पर यदि ‘काले अंग्रेज’ विराजमान हो जाएंगे तो हमारी लड़ाई और भी कठिन हो जाएगी।” भगत सिंह की इस घोषणा के लगभग 17 साल बाद “गोरे
अंग्रेज” तो चले
गये। पर जाते जाते वे सत्ता ‘मैकाले के मानस पुत्रों’
अर्थात “काले अंग्रेजों” को सौंप गये। फिर क्या था, सरकार बदली, झंडा बदला, रंगाई-पुताई के साथ राज-व्यवस्था को भी
नया रंग रूप भी मिला, पर राजसत्ता का ढाँचा वही का वही रहा ।
वही अंग्रेजी कानून, वही अंग्रेजी व्यवस्था । जी हाँ!
राजसत्ता का स्वरूप नहीं बदला। एक तरीका जिसके माध्यम से तीन लाख अंग्रेज
तीस-चालीस करोड़ अविभाजित हिन्दुस्तानियों को नियंत्रित करते थे। यह तंत्र ही
विरासत के रूप में “काले अंग्रेजों” को
प्राप्त हुआ। अंग्रेजों के समय से ही भारतीय समाज में अंग्रेजीयत का वर्चस्व
अंग्रेजों द्वारा राजसत्ता में सहयोग के लिए पैदा किये गये ‘सहभागी
दलाल वर्ग’ का सांस्कृतिक वर्चस्व रहा है । 200 साल के
अंग्रेजी राज में, अंग्रेजों का ‘सहभागी-सहयोगी
अंग्रेजीदां वर्ग’ ही भारतीय समाज में उच्च एलिट वर्ग के रूप
में स्थापित हुआ । यह वर्ग ही शिक्षा, नौकरशाही, कांग्रेस, अंग्रेजों के सहयोगी बडे
जमीन्दारो-साहुकारो के रूप में सत्ता के हर शीर्ष पर काब़ीज भी हुआ और 1947 में
हुए सत्ता हस्तांतरण के बाद भी शीर्षत् पदों पर बना रहा है । स्पष्ट है, झंडा बदला पर डंडा वही का वही रहा । भारतीय समाज में अंग्रेजी ‘मैकाले के मानस पुत्रों’ की ही सुविधा की भाषा है । ‘अंग्रेजीयत’ अंग्रेजी राज के संक्रमंण के दौरान पैदा
हुए उनके सहयोगी-सहभागी वर्ग का ही राजनैतिक, आर्थिक एवं
साँस्कृतिक वर्चस्व भी है ।
26 जनवरी
1950 में लागू हुए संविधान के माध्यम से एक तरफ तो ‘हम भारत के लोग’ के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
की बात कही गयी है। नागरिक अधिकार और नीति निर्देशक सिद्धान्तों के माध्यम से नए भारत
के उदय की उम्मीद जगायी गयी। वहीं संविधान के अनुच्छेद 147, 343(1) व (2), 351 तथा 348 के आड़ में
लूट-खसोट के पुराने अल्पतंत्र को कायम रखा गया है। जी हाँ!
हिन्दी को राज भाषा बनाने वाली संविधान की धारा 343(1) भी एक तरफ तो हिन्दी बैल्ट माने जाने वाले क्षेत्र के लोगों में तत्सम प्रधान
तथाकथित हिन्दी के राष्ट्र भाषा होने का भ्रम पैदा करती है और दूसरी तरफ गैर-हिन्दी-भाषी
माने जाने वाले क्षेत्रों में हिन्दी-भाषी लोगों के वर्चस्व का भय जगाती है।
फलस्वरूप ‘तथाकथित हिन्दी-भाषी’ और
‘तथाकथित गैर हिन्दी-भाषी’ क्षेत्र के लोग एक दूसरे
के प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं। अतः जहाँ तक बंधुता का सवाल है- उसे हिन्दी और गैर-हिन्दी क्षेत्र में भारत को बाट
कर खत्म करने का महान काम अनुच्छेद 343(1) कर रहा है । 343(1) की आड़ में ही अनुच्छेद
343(2), 348, और 147 ही नहीं 343 से लेकर 351 के सभी अनुच्छेद अंततः इंग्लिश के वर्चस्व
को ही कायम रखते हैं। सिद्धान्तः हम भारत के लोगों के सामने अनुच्छेद 350, 350A, और 350B के माध्यम से वंचित
वर्ग द्वारा बोले जाने वाली भारतीय जन भाषाओं के संरक्षण की वकालत तो करता है । पर
व्यवहारतः 1-2% से भी कम के सत्ताधारी वर्ग द्वारा बोले जाने
वाली इंग्लिश का ही संरक्षण संविधान की ये धाराएं करती है । अनुच्छेद 351 हिन्दुस्तानी(हिन्दी)
के प्रसार का भ्रम मात्र पैदा करता है । व्यवहारतः यह राज भाषा हिन्दी ने जन भाषा
हिन्दुस्तानी का ही दमन कर लोगों की अपनी भाषा के प्रति ही विरकत कर के रख दिया
है। लोगों को बैंकों, अदालतों एवं सरकारी दफ्तरों, में प्रयोग होने वाली राज-भाषा
हिन्दी से आसान अंग्रेजी लगने लगती है। राजभाषा हिन्दी के माध्यम से हिन्दुस्तानी
की ही इतिश्री हर साल हिन्दी पखवाडे के साथ देखने को मिलती है। हकीकत में, मूलतः अंग्रेजी
में रचित यह संविधांन अंग्रेजी के वर्चस्व को ही बनाये रखता है। अंग्रेजी का वर्चस्व
विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित कर, अवसर को अंग्रेजी-भाषी
तबके तक समेटे रखता है, भारत के जनसाधारण वर्ग को सामाजिक,
आर्थिक तथा राजनैतिक न्याय से वंचित रखता है। ऐसे में संविधान की उद्देशिका
के माध्यम से व्यक्तिगत गरिमा, राष्ट्र की एकता और अखंडता की बात कपोल कल्पना भर ही लगती है।
जुलाई 2014 में सिविल सेवा चयन हेतु ली जाने वाली सीसैट(CSAT)
की
परीक्षा पर परीक्षा के अभ्यर्थियों का गुस्सा फुटा । तमाम दूसरी परीक्षाओं एवं
दस्तावेजों की भांति सिवल सेवा परीक्षा की सीसेट प्रणाली में भी मूल प्रश्न-पत्र
अंग्रेजी में ही बनता है । हिन्दी में महज़ अव्यवहारिक एवं कृत्रिम अनुवाद भर ही
होता है । इस अनुवाद की प्रक्रिया में प्रचलन से बाहर के शब्दों का प्रयोग किया
गया । जो पढ़ने में तो ‘संस्कृतनिष्ट-तत्सम शब्द’ प्रतित होते है । पर
हकिकत में उनका प्रचलन में कही कोई प्रयोग नहीं होता है । इन अप्रचलित शब्दों ने
ही अभ्यार्थियों को गुमराह किया । पर यह समस्या सिर्फ सी-सेट परीक्षा भर की नहीं
है । आप किसी भी सरकारी दस्तावेज (डॉक्यूमेंट) को उठा ले और चौराहे पर ले जाकर पढ़
भर दे, फिर खुद पता लगाएं कि
कितने लोग संविधान के अनुच्छेद 343(1) के तहत गढी गयी एवं 351 के तहत प्रसारित, इस
‘सरकारी-अनुवाद की हिन्दी’ को समझ भी पाते है ।
सच्चाई तो यह है कि जिस हिन्दी का विरोध हमारे तमिल-तेलगू भाषी भाई करते है,
वह
‘सरकारी-कृत्रिम-एसी’ कमरों में बैठ कर गढ़ी
गयी हिन्दी तथाकथित हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगों की समझ से बाहर की है । युरोप के
छोटे से छोटा देश की राजव्यवस्था जनसामान्य द्वारा समझे जाने वाली जन भाषा में ही
कामकाज करती है । इम देशों में केजी से पीजी तक की शिक्षा अनिवार्यतः परिवेश की
सांस्कृतिक भाषा में ही होती है । सम्पूर्ण विश्व में अंग्रेजी वर्चस्व के प्रतिक
अमेरिका(युएसए) की अधिकारिक राज भाषा अंग्रेजी नहीं है । परिणाम, युरोप और अमेरिका
की सरकारों के सरकारी दस्तावेज मामूली से मामूली पढ़ा लिखा व्यक्ति तक समझ सकता है
। पर भारत में स्थिती कुछ भिन्न है । अंग्रेजी तो है ही परदेशी पर उस अंग्रेजी के
अनुवाद के अनुरूप गढ़ी गयी हिन्दी और भी अधिक अव्यवहारिक है । हकिकत में जुलाई
2014 में उभरा सीसेट आन्दोलन भी इस प्रचलन से बाहर की ‘कृत्रिम-सरकारी-एसीरूम-हिन्दी’ में हुए अनुवाद का ही विरोध
प्रकट किया गया था । ऐसा नहीं है कि इससे पहले की परीक्षाओं में या अन्य परीक्षों
में यह घपला नहीं होता है । घपला तो उसी दिन से चालू है जिस दिन से ‘राज भाषा हिन्दी’ की परिकल्पना गढ़ी गयी
है । ये तो सीसेट परीक्षा के ‘कॉम्प्रिहेंशन’ है जिसने समसस्या को
उजागर कर दिया । जी हाँ ! यूपीएससी(UPSC) ने 2011
से
सी-सैट की नयी प्रणाली लागू कर प्रारंभिक परीक्षा के स्वरूप में परिवर्तन किया है
। कॉम्प्रिहेंशन (बोधगम्यता) अपने आप में मूल्यांकन
की एक बेहतर,
विस्तरित
एवं बहुआयामी पद्धति है । पर सीसेट परीक्षा में संविधान के अनुच्छेद 348 के तहत
मूलरूप से अंग्रेजी भाषा में कॉम्प्रिहेंशन तैयार करने एवं संविधान के अनुच्छेद
351 तहत गढ़ी गयी राजभाषा हिन्दी अर्थात ‘कृत्रिम-सरकारी-एसीरूम-हिन्दी’ में किए गए मैकैनिकल
अनुवाद की वजह से ही सारी समस्या पैदा हुई है । अभ्यार्थी न तो ‘कॉम्प्रिहेंशन’
के
खिलाफ थे न ही ‘रिजनिंग’
के
। अभ्यार्थियों की मुख्य मांग तो मूल प्रश्नों को भारतीय भाषाओं में बनाए जाने की
थी । समस्या के समाधान के लिए भी होना यह चाहिए था कि सभी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र
मूल रूप से भारतीय भाषाओं में ही बनाए जाये और जहाँ कहीं भी अनुवाद की आवश्यकता हो,
तो वह ‘कृत्रिम-सरकारी-ए.सी.रूम-हिन्दी’
अर्थात
इस तथाकथित राजभाषा हिन्दी में न होकर व्यावहारिक एवं प्रचलन के बोलचाल की जनभाषा
में ही हो । पर सरकार ने न केवल इस मांग की अवहेलना की बल्कि आन्दोलन को गुमराह करने
के लिए समस्या के समाधान के नाम पर सिर्फ “अनिवार्य अंग्रेजी के प्रश्नो
में”
छूट
देकर समस्या की इतिश्री कर दी । अब तो युपीएससी ने भी अपनी वेबसाइट पर राजभाषा
विभाग का लिंक भी सांझा किया है । भारतीय भाषा माध्यम के अभ्यार्थियों से उम्मीद
की जाती है कि वे उस लिंक पर दिए गए कृत्रिम-एसीरूम-सरकारी-शब्दों को परीक्षा में
जाने से पूर्व रटेगे ।
इस प्रकार यूपीएससीकी इस परीक्षा ने यह भी सिद्ध
किया कि अच्छे सिद्धान्त को किस तरह बुरे उद्देश्य के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
ऐसा भी नही है कि यूपीएससी के द्वारा 2011 से पहले ली जाने वाली परीक्षा भेद-भाव से मुक्त
थी। यदि हम 2011 से पूर्व के ग्राफ को भी देखें तो पाते हैं
कि प्रारंभिक परीक्षा में बेशक हिन्दी समेत अन्य भारतीय-भाषा माध्यमों से औसतन 45%
प्रतिशत अभ्यार्थीं पास होते होते थे, पर
साक्षात्कार के बाद का आँकड़ा औसतन 10-12% या उस से भी कम रहा
जाता था । अतः इस परीक्षा के पुराने पैटर्न में भी अंग्रेजीदां वर्ग का ही दबदबा
था । 1979 से पूर्व तो यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पूर्णतः
अंग्रेजी में ही ली जाती थी और आज भी यूपीएससी द्वारा ली जाने वाली अधिकतर परीक्षा
अंग्रेजी में ही संपन्न होती हैं । चाहे वह भारतीय आर्थिक सेवा परीक्षा हो या
भारतीय वन सेवा परीक्षा, इन सभी परीक्षाओं के माध्यम से उच्च
ओहदों को अंग्रेजीदां वर्ग के लिए आरक्षित रखा गया है। वही हाल राज्य पीसीएस,
एस.एस.सी., डी.एस.एस.एस.बी., बैंकिंग और तमाम दूसरी नौकरियों का चयन करने वाली संस्थानों का भी है । इन
सभी संस्थानों की चयन परीक्षा में अंग्रेजी प्रश्नपत्र के अनिवार्य हिस्से के रूप
में होता ही है । डी.एस.एस.एस.बी. ने तो अभी हाल ही में चयन परीक्षाओं में पहले से
चले आ रहे अंग्रेजी के वस्तुनिष्ट प्रश्नों के अतिरिक्त अंग्रेजी की वर्णात्मक
परीक्षा को भी अनिवार्यता बनाया है।(जानकारी के स्रोत्र - यूपीएससी रिपोर्ट,
पीसीएस, डीएसएसएसबी वेबसाईट आदि) सच्चाई यह है
कि जिस भी परीक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता है, वह 3%
के अंग्रेजीदा वर्ग को 50-100% तक आगे बढ़ाती
है अर्थात ‘जैक’ लगाती और 95% के गैर-अंग्रेजीदा ग्रामीण, कस्बाई, निम्न एवं निम्न मध्यमवर्गीय आबादी को 30-100 प्रतिशत
तक पीछे धकेलती है । (विशलेषण इस पुस्तक के शोध पर आधारित है।) इन सभी परीक्षाओं
में अंग्रेजी की अनिवार्यता इसलिए रखी जाती है कि अंग्रेजी के सहारे इस देश की
ग्रामीण,कस्बाई गैर-अंग्रेजीदा वर्ग को सत्ता के गलियारे से
दूर रखा जा सके । उच्चत्म न्यायालय और
उच्च न्यायालय (एवं समकक्ष न्यायालयों) में अंग्रेजीदां वर्ग का आरक्षण तो संविधान
निर्माताओं ने संविधान की धारा 348 के माध्यम से सुनिश्चित कर दिया था । जिसे और
अधिक पुख़्ता करने का काम संसद एवं विधानसभा से पारित होने वाले कानून के संदर्भ
में निर्देश देने वाली संविधान की धारा 120 एवं 210 ने किया है । जिसमें स्पष्ट
कहा गया है कि संसद एवं विधानसभाओं को संविधान की धारा 348 के आधीन ही कानून बना
सकती है । अतः संसद राजभाषा हिन्दी(सं.अनु.-343(1)) में एवं विधानसभा राज्य की
राजभाषा(सं.अनु.-345) में कानून पास तो कर सकती है पर उनके लिए अनिवार्य है कि वे
संविधान की धारा 348 के अनुरूप अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत करे । सर्वोच्च न्यायालय
किसी भी वाद की स्थिती में अंग्रेजी में छपे कानून को ही संदर्भ के रूप में देख
सकता है । अंग्रेजी में छपे कानून एवं संघ की राजभाषा-हिन्दी एवं राज्य की
राजभाषा(अन्य क्षेत्रिए भाषाएं जैसे कन्नड,तेलगू, बंग्ला पंजाबी आदि) में विवाद की
स्थिती में अंग्रेजी में छपे कानून को ही सही माना जाएगा । इस धारा 348 की वजह से
ही तमाम परीक्षाओं के प्रश्न पत्रों पर लिखा होता है कि किसी भी वाद की स्थिती में
अंग्रेजी में छपे हुए प्रश्न को ही सही माना जाएगा । परिणाम यह निकलता है कि अंग्रेजी
कामकाज की मूल भाषा बन जाती है और तमाम भारतीय भाषाएं अलंकार हेतू किए जाने वाले
अनुवाद भर ही प्रयोग की जाती है । इस प्रकार भारत के संविधान के माध्यम से ही
सत्ता पर अंग्रेजीदां वर्ग का आरक्षण निश्चित किया गया है ।
संवैधानिक संस्था यूपीएससी, डीएसएसएसबी, राज्यों की पीसीएस, एवं गैर संवैधानिक संस्था यूजीसी,
आई.आई.टी., आई.आई.एम आदि तो ‘बैरिकेटिंग एजेंसी’ भर हैं । जो इस सिस्टम को बनाए
ऱखने का काम करती है । भारत में अंग्रेजी सिर्फ भाषा नहीं व्यवस्था है । भारत के
संविधान की धारा 348, 343(1)&(2),120,210, 351, 147 ने ही अंग्रेजी को व्यवस्था बना दिया है । अंग्रेजी की अनिवार्यता इस
संविधान जनित व्यवस्था का ही परिणाम है । आने-जाने वाली सरकारे ‘ऑपरेटिंग एजेंसी’ के रूप में इस व्यवस्था को ही
पोषने का काम भर करती है । इस सिस्टम के दबाव में ही भारतीय भाषा आन्दोलन से जुड़ें
एवं यूपीएससी के बाहर चल रहे भारतीय भाषा आन्दोलन के धरने पर बैठने वाले अटल
बिहारी बाजपेई जी ने भी सत्ता में आने के बाद न केवल अंग्रेजीदा व्यवस्था के सामने
घुटने टेके बल्कि यूपीएससी(UPSC) के बाहर चल रहे इस भाषाई
अस्मिता को धरने को भी उखाड़ भी फैका । यह
वही आन्दोलन था जिस के धरने में पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह तक भी
राष्ट्रपति के पद से मुक्त होने के बाद बैठे थे। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली
बीजेपी सरकार की स्थिति कुछ भिन्न नहीं है । एक तरफ मोदी जी देश से बाहर जाकर
हिन्दी में भाषण देते है, तो दूसरी तरफ उन्हीं की सरकार सभी भारतीय
भाषाओं में मूल प्रश्न पत्र बनाने की मांग को लेकर चल रहे सी-सेट आन्दोलन का दमन
भी करती है । कारण स्पष्ट है कि सत्ता में आने के बाद सरकार की पहली जिम्मेदारी
संविधान के अनुरूप व्यवस्था बनाए रखने की होती है और कोई भी व्यक्ति या सरकार
संविधान से ऊपर नहीं है। जबतक संशोधन नहीं होता, तब तक सत्ता में आने के बाद हर
सरकार को उसी के तहत चलना पडेगा।
जी हाँ साथियों ! इंग्लिश मीडियम सिर्फ़ स्कूल ही
नहीं होते, इंग्लिश मीडियम अदालतें भी होती हैं। इंग्लिश मीडियम
संसद के कानून भी होते हैं, पी.एम.ओ. समेत सम्पूर्ण नौकरशाही
का ढाँचा इंग्लिश मीडियम ही है। और इन सबको पोसने एवं बचाए रखने का काम व्यवस्था
की ‘बैरिकेटिंग एजेंसी’ जैसे इंग्लिश
मीडियम विश्वविद्यालय, एम्स, आई.आई.टी.,
आई.आई.एम, यु.पी.एस.सी., डी.एस.एस.एस.बी आदि संस्थान करती हैं । यही अल्पतांत्रिक ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ ‘भ्रष्टाचार’, ‘शोषण’, ‘गैरबराबरी’ की
व्यवस्था का ‘साँस्कृतिक ठप्पा’ है ।
स्कूल ! ओह ! स्कूल तो बेचारे इसलिए इंग्लिश मीडियम खुलते हैं क्योंकि ये सभी के सभी
संस्थान अंग्रेजीयत के सामाजिक वर्चस्व के साँस्कृतिक बोध को समाज के अवचेतन मानस पर
जड़ती जा रही हैं। स्कूल व्यवस्था राजसत्ता की उपव्यवस्था है । स्कूली व्यवस्था की
प्रकृति वैसी ही होगी, जैसी राज सत्ता की होगी । चूंकि राज
सत्ता गैर बराबरी को बनाए रखने वाली ‘इंग्लिश मीडियम वर्ग’
द्वारा पोषित है । अतः स्कूली व्यवस्था भी ‘बहुस्तरीय
इंग्लिश मीडियम’ केन्द्रित है । जब तक राजव्यवस्था गैरबराबरी
की ‘इंग्लिश मीडियम’ प्रकृति की रहेगी,
तब तक स्कूली व्यवस्था भी गैरबराबरी की ‘इंग्लिश
मीडियम’ प्रकृति की रहेगी। जब तक राजसत्ता ‘इंग्लिश मीडियम वर्ग’ के हाथ में रहेगी, तब तक ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ का शोषण, दमन और भ्रष्टाचार भी कायम रहेगा। इंग्लिश
मीडियम शिक्षाव्यवस्था समाजिक स्तर का निर्धारण करने वाले के हथियार के रूप में ‘इंग्लिश मीडियम राजव्यवस्था’ के प्रति वफादार लोगों
को ही ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ में
स्थान देती है। ‘इंग्लिश मीडियम राजव्यवस्था’ ‘इंग्लिश मीडियम शिक्षा’ के माध्यम से ही अपने आप को
सुरक्षित रखने का घेरा तैयार करती है। ‘इंग्लिश मीडियम
एजुकेशन’ व्यवस्था के दास के रूप में देश की ग्रामीण,
कस्बाई, निम्न एवं निम्न मध्यमवर्गीय आबादी को
मुख्यधारा से दूर रख सत्ता के शीर्ष को उच्चवर्गीय एलीट क्लास के लिए आरक्षित करता
है। यूपीएससी, आईआईटी, एम्स, आईआईएम और तमाम अति विशिष्ट माने जाने वाले विश्वविद्यालय जैसे – जेएनयू, डीयू., ये सभी के सभी
संस्थान अंग्रेजीयत के सामाजिक वर्चस्व का सांस्कृतिक बोध ही पैदा करने का काम करती
है। इन संस्थाओं में पढ़ा व्यक्ति तो इस देश का कर्णधार बनेगा और मेरठ, गोरखपुर, सारण जैसे देहाती इलाकों के विश्वविद्यालय
का विद्यार्थी चाय बेचेगा । आज अंग्रेजीदां बनने की चाह ने इस देश को अपने मोहपाश
में इस कदर जकड़ा रखा है कि समाज का हर तबका अपना सब कुछ दांव पर लगा कर अपनी भाषा
का शुद्धिकरण की चाह रखता है। भोजपुरी, मैथिली, बांगड़ी बोलने वाले बैकवर्ड कहलाएंगे और दो लाइन अंग्रेजी में गिट-पिटाए
नहीं कि मॉर्डन हो जाएंगे। अंग्रेजीदां बन हर कोई गिट-पिटाना चाहता है । पर भाषा
की प्रकृति यह है कि भाषा ज्ञान परिवेश से स्वतः हासिल होता है, न की स्कूल कॉलेजों की पढ़ाई से। अतः अंग्रेजी
के चक्कर में लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में दाखिला करा तो देते
है पर वे ज्ञान के नाम पर अंग्रेजीयत के गुलाम भर बन कर रह जाते है । अधिकतर
विद्यार्थी पढ़ाए जाने वाले विषय को परिवेश के साथ जोड़ कर देखने के स्थान पर महज
अंग्रेजी में रटते ही है । परिणाम यह निकलता है कि आधिकतर विद्यार्थी औपचारिक
शिक्षा की पहली दहलीज पर ही मुख्यधारा से कट जाते है । डिग्री को ही ज्ञान समझने
का भ्रम पाल बैठते है । इस प्रकार यह अंग्रेजी ही है, जो
इस देश की 95 प्रतिशत ग्रामीण, कस्बाई, निम्न एवं निम्न मध्यमवर्गीय मेहनतकश तबके को व्यवस्था से दूर रखने का काम
करती है। ..और साथ यह ज्ञान, पूंजी, नौकरशाही,
राजनीति के शीर्ष को 3 प्रतिशत ऊपरी तबके तक के लिए सुरक्षित भी
रखती है। राजनीति शास्त्र का सिद्धान्त है सत्ता व्यक्ति एवं संस्थाओं को भ्रष्ट
बनाती है । राजनीति, शिक्षाव्यवस्था, नैकरशाही का 3% तबके तक
सीमित रहना इन संस्थाओं को भ्रष्ट बनाता है और यह भ्रष्ट तंत्र अर्थव्यवस्था को
चंद हाथों तक सीमित रखने का काम करता है । बस यहीं से ‘भ्रष्टाचार’,
‘शोषण’, ‘गैरबराबरी’ का
गड़बड़ झाला अंग्रेजीयत की व्यवस्था के साथ जुड जाता है । अंग्रेजी को सिर्फ भाषा
समझना उसकी ताकत को कम कर आंकना है। अंग्रेजी सिर्फ भाषा नहीं भारतीय समाज में तो
वर्चस्व का बोध ही है । ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’
ही शोषण और गैर-बराबरी के अल्पतांत्रिक-पंगु-पूँजीवादी किले
को बनाए रखने वाली साँस्कृतिक दीवार को पुख्ता करने का काम करती है । सत्ता को चंद
हाथों तक समेटे रख कर, यह सिस्टम उस किले के चारों और भ्रष्टाचार
की सड़ांध वाली दलदली जमीन निर्मित करता है। बिना इस ‘इंग्लिश
मीडियम तंत्र’ को नेस्तनाबूद किए, न
तो भ्रष्टाचार की गंदगी को दूर किया जा सकता है और न ही सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी
को बनाए रखने वाली किले की दीवार को ही ढहाया जा सकता है। आम जनता की समझ से परे की
भाषा का अल्पतंत्र ही आम जनता को भ्रम और असमंजस की स्थिति में रखता है।
इस पुस्तक का मूलभाग लेखक के शोध कार्य ‘अंग्रेजी माध्यम स्कूलों’ तथा जन समुदाय के मध्य हुई सामाजिक-सांस्कृतिक अन्तःक्रियाओं के फलस्वरूप
‘जन सामान्य’ के सांस्कृतिक मूल्यों’ पर पड़ने वाले प्रभाव का ‘विश्लेषणात्मक-मूल्यांकन’ (विशेषतः) ‘बाल केन्द्रित
पाठ्यचर्चा’ को लागू करने के संदर्भ में’ पर आधारित है। दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग
में जमा कराए, इस शोध के
अध्ययन के दौरान और उससे भी पहले मैंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों में पाया कि किस प्रकार
‘इंग्लिश मीडियम केन्द्रित एजुकेशन (औपचारिक
शिक्षा)’ व्यवस्था राजव्यवस्था के एजेंट के रूप में ग्रामीण-कस्बाई-निम्न एवं निम्नमध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि के
90% लोगों को सिस्टम से बाहर करती है और इस प्रकार सत्ता के तमाम केन्द्रों
की बागडोर 1-2% मैकाले के मानस वंशजों के हाथ में बनाए रखने का
काम करती है। साँस्कृतिकरण के टूल के रूप में ‘इंग्लिश मीडियम
केन्द्रित एजूकेशन सिस्टम’ 5-8% लोगों का ‘साँस्कृतिकरण’ ‘सिस्टम’ की जरूरत
के अनुरूप मानक भाषाओं में करता है। ये 5-8% लोग ही सिस्टम के
विभिन्न पायदानों पर सिस्टम के भागीदार बनते हैं। इन 5-8% लोग
के हिस्से ही सिस्टम की मलाई भी पहुँच पाती है। ये लोग ही सिस्टम के साँस्कृतिक दलाल
के रूप में स्थापित होतें हैं और फिर क्या, शेष समाज उनके पीछे
भेड़ों की तरह चल पड़ता है। वे शेष समाज के लिए आदर्श बन जाते हैं।
इस देश में शिक्षा तो उसी दिन राज-व्यवस्था के हाथ का खिलौना बन गयी,
जिस दिन स्वायत्त पाठशाला व्यवस्था को भंग करने के लिए ब्रिटिश कम्पनी
हुकूमत ने अंग्रेजी केन्द्रित स्कूली व्यवस्था की नीव डाली थी । भारत में स्कूली और विश्वविद्यालयी शिक्षा
का संपूर्ण ढाँचा कम्पनी एवं ब्रिटिश राज में खड़ा किया गया है और आज भी तमाम सतही
प्रयासों के बावजूद भी औपनिवेशिक जरूरत के अनुरूप ही है। औपचारिक शिक्षा के संस्थान
के रूप में स्कूल और विश्वविद्यालय राजसत्ता की उप व्यवस्था ही है और ये राजसत्ता की
जरूरत के अनुरूप सामाजिक स्तरीकरण का काम करते हैं । अतः स्कूल इसलिए इंग्लिश मीडियम
हैं क्योंकि राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है और राजसत्ता इसलिए इंग्लिश मीडियम है क्योंकि
‘परदेशी इंग्लिश’ राजसत्ता को एक दो प्रतिशत इंग्लिश-हिंग्लिश लोगों तक समेटे रखने का सबसे आसान और कारगर साधन है। इंग्लिश सिर्फ
भाषा नहीं है, यह तो शासक और शासितों के मध्य अन्तर बनाने का
साधन भी है। अतः इंग्लिश हम भारत के लोगों को न केवल नियंत्रित अपितु भ्रमित रखने का
सबसे आसान साधन है।
जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है, तब तक साँस्कृतिक भाषाओं में समान
स्कूली व्यवस्था की बात सोचना तक बेवकूफी है। जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है,
बच्चों की सांस्कृतिक परिवेश में बाल केन्द्रित रचनात्मक एवं विवेचनात्मक
शिक्षाशास्त्र की बात हम भारत के लोगों के साथ बेईमानी और धोखा है। जब तक राजसत्ता
इंग्लिश मीडियम है, शिक्षा का सार्वभौमिकरण (संविधान का अनुच्छेद 21A) महज़ एक युटोपिया है। कॉमन
स्कूल की लड़ाई को खतम कर उसकी आड़ में इंग्लिश मीडियम प्राईवेट स्कूलों में
25% EWS कोटे की दुकानदारी है। जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है,
तब तक इंग्लिश मीडियम स्कूलों की भेड़ चाल को रोक पाना असंभव ही नहीं
नामुमकिन भी है। अतः जब तक उच्च शिक्षा की व्यवस्था इंग्लिश मीडियम है तब तक राजव्यवस्था
1-2% अंग्रेजी-भाषी लोगों के हाथों में सुरक्षित है। अतः जन शिक्षा को
मुक्तिदाई, काम आधारित रचनात्मक एवं विवेचनात्मक बनाने के लिए
राजसत्ता को इंग्लिश मीडियम के नियंत्रण से मुक्त करने की जरूरत है।
-
अश्विनी कुमार ‘सुकरात’
Comments